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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

किराये की साइकिल‌

कहानी उन दिनों की है जब स्कूटर का आविष्कार नहीं हुआ था | साईकिल और वह भी नई साइकिल दिलों का अरमान थी | मेरे पास तो कोई साइकिल नहीं थी इसलिये किराये की साइकिल ही मेरे अरमानों को पूरा कर सकती थी | किराये के पैसे भी कहाँ थे, इसलिये रोज रोज तो साइकिल को नहीं लिया जा सकता था, किराये पर | हाँ कभी कभी मौका मिल जाता था, तो छोटी सी सुन्दर सी साइकिल किराये पर घंटे, आधे घंटे के लिये मैं लेता और उसका आनन्द उठाता | साइकिल लेकर मैं बहुत तेजी से उसे चलाता, बाजार की भीड़ में टेड़ीमेड़ी चलती मेरी साइकिल | कभी मैं उसे हाथ छोड़कर चलाता, कभी पीछे की सीट पर बैठकर, कभी खड़े होकर |कभी बहुत धीमी गति से उसे चलाने की कोशिश करता, इतना धीमे कि गिरते ही बचता | साइकिल कभी पूरे दिन भर के लिये भी किराये पर मैं ले लेता, फिर हम, याने कि मैं और मेरे अन्य मित्र चलते कहीँ पिकनिक मनाने | लम्बी दूरी पर चलने का साइकिल पर क्या आनन्द आता, बस मजा ही आ जाता था | साइकिल को चलाने के लिये जोर लगाना पड़ता था | कभी कभी तो किसी अन्य मित्र को पीछे बिठाकर भी हम साइकिल चलाते | इस प्रकार जीवन का आनन्द साइकिल के आनन्द पर निर्भर था |

एक दिन की बात थी कि हम चार मित्र अलग अलग दुकानो से साइकिल लेकर निकले और चल पड़े अपनी मञ्जिल की और | एक अत्यन्त सुन्दर पिकनिक स्थल की और | सुना था कि पिकनिक स्थल पर एक सुन्दर सी नहर है , नहर के पास फूल फल के बगीचे, आमों के बाग, बागों में कोयल की कू कू, मोरों की चहल पहल, व अन्य वन्य जीव जैसे खरगोश आदि की टोलियाँ | वहाँ पहुँचने की सबको बहुत जलदी थी, क्योंकि ऐसे सुन्दर स्थल पर पहुँचने का सबको बहुत समय से अरमान था | पर यह स्थल था बहुत दूर, अत्यन्त दूर | इस सुन्दर स्थल पर हम प‌हली बार जा रहे थे | इसलिए रास्ते का भी हमें पूरी तरहँ से पता नहीं था | वहाँ क्या क्या है, कैसा कैसा है, सब कल्पना की बात थी, जो सुनी हुई बातों से सबने अपने अपने मन में बनाई थी |

किराये की साइकिल , चार मित्र, दूर एक मञ्जिल, जहाँ जाने का निश्चय करके हम सब अपने अपने घर से निकले थे | अलग अलग स्थलों से साइकिल ली, फिर एक स्थल पर जा मिले और निश्चित किया, कि आज हम वहाँ पर चलेंगे जहाँ हम आज तक नहीं जा पाये थे | चूँकि वह लक्ष्य बहुत दूर था, इसलिये यह तय‌ किया गया कि पहले अपनी अपनी साइकिलों को पूरी तरहँ से ठीकठाक करवा लें, ऐसा न हो कि कोई साइकिल रास्ते में ही धोखा दे जाए | तो फिर हम लगे अपनी अपनी साइकलों को ठीकठाक करवाने में | उसके सभी अंगो में तेल डलवाया, ग्रीस लगवाई, फिर खूब हवा टाइट की, ब्रेक चैक करवाये और चल पड़े | रास्ते की तलाश में, उस स्वर्णिम पिकनिक स्थल की तलाश में जिसके बारे में बहुत कुछ सुना था |

थे तो हम मित्र लेकिन उस दिन की घटना मन को विह्वल कर देने वाली थी | सभी के अरमान एक जैसे ही थे | सबके पास साइकिल भी एक जैसी ही थी परन्तु न जाने कैसे सभी की मञ्जिल एक होते हुए भी, वहाँ पहुँचने के रास्ते एक नहीं थे | उनके मस्तिष्क में छपे हुए रास्ते अलग अलग निकले | किस राह से चलें ? सब अपनी अपनी राह का बखान करने लग गये | एक कहता इधर से चलो तो दूसरा कहता नहीँ इधर से नहीँ उधर से, तीसरा कहता नही इधर से नही, उधर से भी नहीं, एक दूसरे ही रास्ते से चलो | चौथे का भी अपना अलग रास्ता निकला | चार मित्र, एक मञ्जिल, रास्ते अलग अलग | कौन बताये क्या किया जाए ? किसकी बात को सब मानें और किसकी बात को नहीं | समय बीतने लगा पर कोई किसी की बात मानने को राजी नहीं हुआ, क्योंकि सभी यह मान बैठे थे कि उन्ही को सही रास्ते का पता है, अन्य किसी को नहीं | रास्ते की बहस ने मित्रों को अमित्र बना दिया | वे जो खुशी खुशी मञ्जिल को पाने के लिये घर से निकले थे, वे अब एक मित्र नहीं, एक दुश्मन बन गये थे | साइकिलें किराये की थीं , दिन बढ़ता जा रहा था ढलने की और, सब दुश्मन मुँह बनाए अपनी अपनी अलग अलग राह पर चल पड़े | ऐसे में मञ्जिल कहाँ मिलनी थी, मिल भी जाती तो क्या मजा आता ? जब मित्र ही साथ नहीं तो मञ्जिल किस काम की थी ? मुँह लटकाये सब वापिस बैरंग अपनी अपनी दुकानो की और बढ़ चले थे, जहाँ से किराये की साइकिलें लीं थी | पूरे दिन का किराया सौंप वापिस घर की राह सब ने ली | फिर नींद कहाँ आनी थी, रातभर पलंग पर इधर से उधर पलसेटियाँ मारते मारते, तारे गिनते गिनते दिन निकल आया | पर चैहरे पर् उदासी स्पष्ट झलक रही थी, ताजगी को जैसे कुत्ता चाट गया था | साइकिल की सारी खुशी, दुख में बदल गयी थी, साइकले तो वापिस चली गयी, किराया जेब से गया और दोस्ती दुश्मनी में बदल गयी | धत्तेरे की! यह भी कोई बात हुई ?

आज जीवन की कहानी भी कुछ इसी तरहं से घट रही है | जीवन भी एक साइकिल है, जिसका किराया देने पर, यह हमको मिली | मिली इसलिये कि हम मिलजुल कर मञ्जिल को पालें, पर हम तो झगड़ पड़े रास्ते को लेकर | रास्ते अलग अलग हो सकते हैं पर क्या मञ्जिल भी सबकी अलग अलग है ? किराये की साइकिल तो सबकी एक जैसी ही है | साइकिल चलाने के नियम, रास्तों पर चलने के नियम, सभी एक जैसे हैं | रास्ते कुछ छोटे कुछ लम्बे हो सकते हैं, पर यदि मञ्जिल एक है तो लड़ाई कैसी ? सब चल कर क्यों नहीं देख लेते, किस रास्ते से कहाँ पहुँचते हैं ? सब मिलकर रास्ते को क्यों नहीं तलाशते ? अलग अलग ,यदि हम मञ्जिल पर पहुँच भी गये तो उससे क्या लाभ होगा , उसका क्या मजा आयेगा ? जब तक सब साथ न चलेंगे, किसी एक के भी अलग रहने का दुख क्या हमें नहीं सतायेगा ? तो किराया समाप्त होने से पहले ही साइकिल का पुरा पूरा प्रयोग हम क्यों नहीं कर लेते | मिलकर मञ्जिल को ढूंढ लें, मिलकर उस तरफ चल पड़ें, मिलकर उसका आनन्द लें और फिर खुशी खुशी घर को लौट चलें | अगले दिन एक नयी राह पर चलने के लिए | एक नये जीवन के लिए ||

बहुत

बहुत सुंदर | धन्यावाद |