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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आततायी का वध‌

ओउम | इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम् |
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन्त्सूर्यमुच्चरन्तम् ||

अथर्व वेद 8/4/24

शब्दार्थ -

हे इन्द्र अन्यायनाशक राजन्
मायया चालाकी से
शाशदानाम् पीड़ा पहुँचाने वाले
यातुधानम् आततायी
पुमांसम्+उत+स्त्रियम् पुरुष और स्त्री को
जहि मार दे
मूरदेवाः हिंसा ही है आराध्य जिनका ऐसे
विग्रीवासः ग्रीवारहित होकर
ऋदन्तु नष्ट हों
मा मत
ते वे
उच्चरन्तम् उदय होते
सूर्य्यम् सूर्य को
दृशन् देखें |

व्याख्या -

इस मन्त्र में राजा को एक ऐसा आदेश है कि कदाचित् साधारण लोग जिसे जानकर काँप उठें, किन्तु राजा का काम है राज्य में शान्ति और व्यवस्था स्थापित करना तथा उसे स्थिर रखना | वह शान्ति नहीं, जिससे राज्य की श्रीवृद्धि न होकर प्रतिदिन ह्रास होता जाए, शान्ति और व्यवस्था का परिणाम धनधान्य की संवृद्धि, स्वास्थ्य‌ की वृद्धि, कला और विज्ञान की प्रवृद्धि होनी चाहिए | यह तभी हो सकता है जब राजा सब कार्य्य छोड़कर राजकार्य्यों को लगन से करे | वेदानुयायी ऋषियों ने तो राजकार्य्य ही राजा का सन्ध्योपासना कर्म माना है |यथा - " (राजा) सदा राजकार्य्य में प्रवृत रहे अर्थात यही राजा का सन्ध्योपासनादि कर्म है जो रात-दिन राज कार्य्य में प्रवृत रहना और कोई राजकर्म बिगड़ने न देना |" (स.प्र., षष्ठ सम्मुलास‌)

यदि राज्य में ऐसे लोग उत्पन्न हो जाएँ जो लोगों के घरों को आग लगा दें, लोगों के सस्य जला दें, स्त्रियों और बालकादिकों को व्यर्थ ही पीड़ा दें और राजा उन्हें दण्ड न दे, तो सभी के प्राण संशय में रहने लग जाएँ, सभी प्रकार के कार्य, व्यवहार, व्यापार बन्द हो जाएँ, खेती न हो सके, कलाकौशल , शिल्प आदि सब नष्ट हो जाएँ और सम्भव है कि कोई अन्य साहसी राजा आक्रमण करके राष्ट्रृ को पराधीन कर दे, अतः राजा का कार्य्य - मुख्य कार्य्य - ऐसे आततायी -यातुधान- लोगों का वध करके राज्य में शान्ति स्थापित करना है | अथर्व वेद (8/4/21) में स्पष्ट कहा है -

इन्द्रो यातूनामभवत्पराशरो हवर्थीनामभ्याविवासताम् = राजा लोगों को जीवन सामग्री के नाशक तथा लोगों को बेघर करने वाले यातधानों आततायियों का सर्वथा नाशक होता है |

आर्यधर्म्म में स्त्री को अवध्य माना है, किन्तु यदि वह यातुधान हो, आततायी हो तो राजा का कर्तव्य है कि उसे मार दे | यही वेद कहता है

इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम् = हे राजन् छल कपट से हिंसा करने वाले आततायी पुरुष और स्त्री को मार दे | स्त्री तभी तक अवध्य है जबतक वह स्त्री मर्यादा का पालन करती है, जब वह आततायी हो जाती है, तो अपनी अवध्यता को खो बैठती है |

मनु महाराज ने इस मन्त्र का, मानो निम्न श्लोकों में आशय ही वर्णन किया है -

गुरुं व बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् |
आततायिनमायान्तं हन्यादे वाविचारयन् || 8/350 ||
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन |
प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्य्मृच्छति || 8/351 ||

चाहे गुरु हो, चाहे पुत्रादि बालक हों, चाहे पितादि वृद्ध और चाहे बहुत शास्त्र का श्रोता क्यों न हो, जो धर्म्म छोड़कर, अधर्म्मरत होकर, निरपराधों की हत्या करने वाला आततायी है उसको बिना विचारे मार डाले, अर्थात मारकर पीछे विचार करे | आततायी को मारने में मारनेवाले को पाप नहीं होता, चाहे प्रक‌ट मारे, चाहे गुप्त मारे | वह क्रोध को क्रोध का प्राप्त होना है | वेद ऐसे आततायियों=यातुधानों के बहुत विरुद्ध है | अतः इनको विग्रीव=ग्रीवारहित करने का आदेश करता है | इतनी बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यह राजा का कर्तव्य है | वही निर्णय कर सकता है कि कौन आततायी है और कौन नहीं ? यदि प्रत्येक मनुष्य ही यह निर्णय करे तो फिर व्यवस्था ही न रह सकेगी, इसीलिए समाजव्यवस्था एवं राज्यस्थापना की जाती है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)