Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Narnder Modi Poem Basnt

अंत में आरंभ है, आरंभ में है अंत,

हिय में पतझर के कूजता वसंत।

सोलह बरस की वय, कहीं कोयल की लय, किस पर है उछल रहा पलाश का प्रणय ?

लगता हो रंक भले, भीतर श्रीमंत

हिय में पतझर के कूजता वसंत।

किसकी शादी है, आज यहाँ बन में ? फूट रहे, दीप-दीप वृक्षों के तन में

देने को आशीष आते हैं संत,

हिय में पतझर के कूजता वसंत।

Dhanyavad

Dhanyavad