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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

योग दर्शन १-२६

स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ||26||

[स एषः] वह यह (ईश्वर) [पूर्वेषाम् अपि] पूर्व गुरुओं (ऋषियों, महर्षियों) का भी [गुरुः] गुरु है [कालेन] काल के द्वारा [अनवच्छेदात्] नष्ट न होने से |

ईश्वर प्रदत्त ज्ञान को प्राप्त करके ही कोई शरीरधारी व्यक्ति गुरु बनने में समर्थ होता है, इसलिए वह परमेश्वर सृष्टि के आदि से लेकर अब तक जितने भी ऋषि, महर्षि, आचार्य, अध्यापक, उपदेशक इत्यादि गुरु हुए हैं तथा जो आगे होंगे, उन सबका भी गुरु है | क्योंकि वह काल से क‌भी नष्ट नहीं होता, वह अमर है | इसी प्रकार से वह पिछली सृष्टियों में भी सबका गुरु था और आगे आने वाली सृष्टियों में भी सबका गुरु रहेगा