Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अन्नप्राशन

अन्नं न निन्द्यात् तद् व्रतम् |
अन्न की निन्दा=अपमान, दुरूपयोग, अन्न को फैंकना, अन्न क उपेक्षा से उपयोग करना, उच्छिष्ट (झूठन) छोड़ना आदि सभी अन्न की निन्दा के अन्तर्गत हैं |

आहार

आहार शुद्धि के लिए बालकों का अन्नप्राशन संस्कार आवश्यक है

अन्नं न

अन्नं न निन्द्यात् तद् व्रतम् |
अन्न की निन्दा=अपमान, दुरूपयोग, अन्न को फैंकना, अन्न क उपेक्षा से उपयोग करना, उच्छिष्ट (झूठन) छोड़ना आदि सभी अन्न की निन्दा के अन्तर्गत हैं |

" अन्नं न

" अन्नं न निन्द्यात् तद् व्रतम् |"
हमें अन्न की निन्दा न करने का व्रत लेना चाहिए |
"अन्नं साम्राज्यानामधिपति: |"

महर्षि

महर्षि दयानन्द निर्मित "संस्कारविधि" ग्रन्थ के अनुसार क्रम से गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण इन छ: संस्कारों के बाद सातवां "अन्नप्राशन" संस्कार है |

"अन्नं

"अन्नं ब्रह्म तदुपासीत |"

अन्न को ब्रह्म समझ कर उसका यथोचित उपयोग करना चाहिये |

अन्नप्राश

अन्नप्राशन संस्कार का उद्देश्य बालक को तेजस्वी, बलशाली एवं मेधावी बनाना है| बालक को घृतयक्त भात अथवा दही, शहद और घृत तीनों को मिलाकर अन्नप्राशन कराने का विधान है |

उतना ही

उतना ही लें थाली में, कि व्यर्थ न जाये नाली में

धरती मां

धरती मां अपनी छाती फाड़ के हमें अन्न देती है, इसलिये हमें अन्न बरबाद नहीं करना चाहिये |

राष्ट्रकव

राष्ट्रकवि दिनकर की रचना

ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो,
प्रकृति दुल्हन का रूप धर
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी,
तब चैत्र-शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय-गान सुनाया जायेगा...

नव संवत्सर १८.०३.२०१८ रविवार की अग्रिम बधाई

॥ वन्दे मातरम॥