ओउम्! तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिरिदा चिदह्न इदा चिदक्तोः |
श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके ||
ऋग्वेद 4|10|5
सब्दार्थ -
हे अग्ने........अग्ने!
तव ...........तेरी
स्वादिष्ठा........स्वादिष्ट=अत्यन्त स्वादु=अतिशय मीठी
संदृष्टिः.........उत्तम दृष्टि, नेक नजर
इत्.............ही
अह्न+चित्+आ....दिन से लेकर
अक्तोः+चित्+आ ..रात तक
इत्.............ही
रुक्मः+न........सुवर्ण की भाँति
उपाके..........समीप में
श्रिये............कल्याण के लिए
रोचते...........चमक रही है
व्याख्या -
कविजन बताते हैं, दृष्टि दृष्टि है, इससे कइयों को घायल होते सुना गया है | कामी जनो की ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं, जिनमें कमनीय के एक दृष्टि निक्षेप से कामी उन्मत्त हो गया | क्रोधी मनुष्य की दृष्टि लाल हो जाती है, उसकी आँख से आँख मिलाना कठिन हो जाता है | बालक जो अभी मनोगत भावों को पूर्णरूप से व्यक्त नहीं कर सकता, विह्वल हो कर जब माता को देखता है, तो माता की ममता कैसे प्रदीप्त होती है ? माँ की इस दशा का मूल क्या है ? बालक की दृष्टि | क्रोध या उदासी की द्शा मे बालक माँ के सामने जाता है | माता उसे स्नेहमयी दृष्टि से देखती है, उसके क्रोध या उदासी के भाव वहीं विलीन हो जाते हैं | किसके प्रभाव से ? माता की ममताभरी स्नेहसिक्त संदृष्टि से | दृष्टि की बड़ी महिमा है, यह हँसतों को रुला देती है, रोतों को हँसा देती है,मित्र को शत्रु बना देती है और शत्रु को प्राणपण से प्रीति करने वाला सुह्रिद् बना देती है | सन्तजन सुनाते हैं, किसी महापुरुष का कृपाकटाक्ष अधम से अधम पुरुष का बेड़ा पार कर देता है | उसकी चित्त नदी, जिसका प्रवाह पाप सागर की और था, प्रवाह बदल कल्याणसमुद्र की और बहने लगती है |
मनोविज्ञान के आचार्य बतलाते हैं कि दृष्टि भीतर के मनोभावों की निदर्शिका होती है | तभी संसार में 'ललचाई आँख' 'क्रोध से लाल आँख' 'प्रेम भरे नेत्र' 'मदमाते, अलसाते नयन' आदि प्रयोग होते हैं | भिन्न भिन्न भावों की अभिव्यक्ति के समय आँख में कोई एक अवर्णनीय सा परिवर्तन होता है | ज्ञानी और मूढ़ बिना सिखाये इसे जानते हैं | इस मनोवैज्ञानिक आकृतिविज्ञानमय दृष्टिभेद को लक्ष्य कर कामना की गई है
तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिः
अग्ने! तेरी अत्यन्त मीठी नजर |
मार्ग दिखानेवाला आँख मैली कर ले, तो समझ लो कि यह अमार्ग में पटकेगा | गुरु की कुदृष्टि हुई तो जान लो विद्या में बाधा आई | गुरुओं के गुरु की यदि संदृष्टि न रही, तो फिर क्या गति होगी ? जिसके एक कुदृष्टि निपात से यह समस्त जगत् समाप्त हो सकता है, उसकी कुदृष्टि से कितना अनिष्ट हो सकता है ? अतः याञ्चा हे - तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिः | इस वेदमन्त्र से यह प्रतीत होता है कि भगवान की तो सदा संदृष्टि ही संदृष्टि चमक रही है, फिर संसार क्यों व्याकुल है ? उसकी संदृष्टि की और पृष्ठ कर देने से | दृष्टि सामने होने पर ही प्रभाव करती है | जब हमने पीठ फेर ली, या आँख मूँद ली, तब संदृष्टि हमारी दृष्टि से औझल हो गई, और हम संदृष्टि के पुनीत फल से वंचित हो गये, किन्तु जिन्होंने तेरी संदृष्टि पाली वे -
नामानि चिद् दधिरे यज्ञियानि भद्रायां ते रणयन्त सन्दृष्टौ || - ऋग्वेद् 6|1|41
तेरी भली सन्दृष्टि में आनन्द करते हुए पूज्य नामों को धारण करते हैं | भगवान की सन्दृष्टि - भद्र संन्दृष्टि - स्वादिष्ट् सन्दृष्टि जिन पर पड़ गई, उनके नामों की पूजा न होगी तो किनकी होगी ? जो भद्र है वह स्वादिष्ट है | अभद्र, अमंगल किसे स्वादु लग सकता है ? वह तो सबको कटु लगता है | प्रभो हमें क्या तेरी संदृष्टि न दीखेगी ? हमारे नेत्रों का परदा तू ही हटाएगा | प्रभो।
यतै रूपं कल्याणतमं पते पश्यामि | (ईशो. 16)
तेरा तेजोमय अतिशय कल्याणकारी जो रूप है, उसे मैं देखता हूँ | प्रभो! पश्यामि कहने का अधिकार कब मिलेगा ?
