राग और राह

" दिल बेकरार है, तेरा इन्तजार है "

क्यों यह राग अलापे जाते हो!
बचपन से बूढ़ा होने तक, क्यों राग यही दोहराते हो
क्यों मार्ग नहीं कोई हमको, यह डग‌र छोड़ने का मिलता
क्यों घिसी पिटी राहों पर चल, फिर वापिस घर को आते हो
क्या आँखें नहीं मिली हमको, क्या बुद्धि हमारी कुण्ठित है
क्योँ कुएँ के मैंढक बनकर, उससे न बाहर आते हो
जब हैं अनन्त राहें आगे, आगे अनन्त ब्रह्माण्ड खड़ा
क्यों नाता केवल अपनों से, अपने ही घर में बनाते हो

जब विश्व प्रेम की सलिल धार, सबके भीतर ही बहती है
क्यों भूल उसे फिर चुल्लूभर पानी में रोज नहाते हो
सब हंडिया अपनी पका रहे!
और अपने उदर का पालन कर, हम फूले नहीं समा रहे
पलभर को पर यह सोचा न, जब हंडिया इक दिन फूटेगी
होगा क्या हश्र हमारा फिर, फिर किसका दर खटकाएंगे
जब नाता न जोड़ा हमने, उस विश्व प्रेम की धारा से
तो कैसे राह बनाएंगे, दुख से कैसे बच पाएंगे

आओ वह राह प्रशस्त करें. जो कुण्ठित न हमको रख्खे
और जो अजर अमर आनन्दमयी, व्यापक विशाल और उत्तम है
जो दूर नहीं हमसे तनिक, सबके भीतर ही बहती है ||