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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्राणायाम के द्वारा ज्ञान‌

ओउम्! वीळुचिदारुजलुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्रिभिः |
अविन्द उस्त्रिया अनु ||

ऋग्वेद 1|6|5

शब्दार्थ -

हे इन्द्र....... जीवात्मन् ! तू
आरुजलुभिः.... पीड़ा देनेवाले, शान्त करने वाले
वह्रिभिः....... जीवन धारण के कारणभूत, प्राणो के द्वारा
गुहा+चित्.....छिपी हुई भी
उस्त्रिया........ज्ञान किरणो को
वीळु+चित्.....शीघ्रता से ही
अनु+अविन्दः..अनुकूलता से प्राप्त करता है |

व्याख्या -

थोड़े से शब्दों में प्राणायाम का महत्त्व बतलाया है | यहाँ प्राण को प्राण न कहकर 'वह्रि' कहा गया है |लौकिक संस्कृत में वह्रि शब्द का अर्थ है आग | जब तक प्राण शरीर में रहते हैं तभी तक शरीर में जीवनाग्नि रहता है | प्राणो ने प्रयाण किया और यह शरीर ठण्डा पड़ गया, अतः प्राण सचमुच आग है | आग जहाँ सुख का साधन है, पीड़ा भी देती है | आग की पीड़ा का अनुभव गर्मी की ऋतु में पूरी तरह होता है | प्रत्येक पदार्थ सूखने लगता है | इसी प्रकार प्राण-अग्नि को जब ईंधन नहीं मिलता, तब यह शरीरस्थ‌ मांस और रक्त को जलाने लगता है, किन्तु प्राणो का पीड़ादायकत्व पूरा पूरा मरणसमय में ज्ञात होता है | भोग समाप्त हो चुका है | कालाग्नि प्राणपखेरु को देहपिंजरे से निकालने को आया है | प्राण के मार्ग रुके हैं, उसे राह नहीं मिल रही, वह जोर लगा रहा है, तड़प रहा है | मुमूर्षु की यह दुर्दशा देखकर मुमुक्षु इन पीड़ादायक प्राणो को वश में करता है, मृत्यु समय निकट आया जान आराम से इन प्राणो को खींचकर वह बाहर कर देता है |

वह प्राणो को आग = जलानेवाला न रहने देकर वेद का वह्रि = धारक, ले चलने वाला बना देता है | अब प्राण को वह्रि बना लिया गया है, वे धारित किये गये हैं, उनकी गति रोक दी गई है, अतः वे भी धारक बन गये हैं | इस विषय में प्राण व धर्म्म की एक ही गति है | मारने से धर्म मार देता है, पालने से पालता है, प्राण आग बना देने से जलाता है, वह्रि = धारण करने वाला बना देने से जिलाता है | चुन लो जीना है या जलना है ?

वह्रि बन कर भी प्राण आरजन्तु = तोड़ने फोड़ने वाले बने हुए हैं | अब ये अंगो को नही तोड़ते, अब यह शरीर को पीड़ा नहीं देते, क्योंकि प्राणो की क्रिया से शरीर का सब मल शुद्ध कर लिया गया है | अब यह आत्मा पर पड़े अज्ञान आवरण के परदे को फाड़ते हैं | इसीलिए वेद कहता है -

अविन्द उस्त्रिया अनु = आत्मन्! तू ही ज्ञान किरणो को अनुकूलता से प्राप्त कर लेता है | योगीराज पतञ्जलि ने अपने अनुभव से वेद की इस सचाई की पुष्टि की है -
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् - योगदर्श‌न‌ 2/52 | प्राणायाम की सिद्धि से बुद्धिप्रकाश पर पड़ा हुआ आवरण = परदा नष्ट होता है |

वेद ने इससे भी अधिक बताया है -

यदा गच्छात्यसुनीतिमेतामथा देवानां वशनीर्भवाति |.....ऋग्वेद 10|16|2

जब साधक इस असुनीति = प्राणचालन विद्या को प्राप्त कर लेता है, तब वह इन्द्रियों का वशकर्त्ता हो जाता है |

इन्द्रियों को वश में करना है, तो प्राण को वश में करो | बहुत गहरा अभिप्राय है | इन्द्रियां मन के अधीन हैं | मन बहुत चञ्चल है, जविष्ठ है - सबसे अधिक वेगवान है; जिधर वह जाता है, इन्द्रियाँ भी उधर ही जाती हैं | प्राणचालन विद्या से इन्द्रियों को वश में करने के अर्थ हैं इन्द्रियाधिष्ठाता मन को भी वश में करना | यही अवस्था योग है, जैसा कठोपनिषद् में कहा है -

यदापञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह |
बुद्धिश्च न विचेष्ट‌ति तामाहुः परमां गतिम् ||
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ||........कठोपनिषद् 2/3/10, 11

जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ रुक जाती हैं और बुद्धि भी निश्चल हो जाती है, उस अवस्था को परमगति कहते हैं, इन्द्रियों की उस स्थिर धारणा को योग मानते हैं | इन्द्रियाँ वश में करनी हों अर्थात इन्द्रियों से यथायोग्य उपयोग लेना हो, तो प्राणायाम का अभ्यास करो | बुद्धि पर से अज्ञान का परदा नाश करना हो, उज्ज्वल, विमल, धवल ज्ञान प्रकाश प्राप्त करना हो, तो प्राणायाम में सिद्धि प्राप्त करो |

प्राणायाम के महाज्ञानी ऋषि दयानन्द 'सत्यार्थप्रकाश' के तृतीय समुल्लास में लिखते हैं -
जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है | जब तक मुक्ति न हो उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़‌ता जाता है |..... जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर वे शुद्ध होते हैं, वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं |..... प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं | बल पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य, शरीर में वीर्य्य वृद्धि को प्राप्त होकर, स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता (तथा) सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर, उपस्थित कर लेगा | स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे |

प्राणायाम की महिमा में वेद, मनु, पतञ्जलि, दयानन्द सभी एकमत हैं |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)