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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बाल की खाल निकालना

ओउम्! निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन |
सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन ||

ऋग्वेद 1|161|7

धीतिभिः..........मननों के द्वारा
गाम्..............वाणी को
चर्मण्:...........चमड़े से
निः...................रहित करके
अरिणीत‌...............प्राप्त‌ करो |
या....................जो दो (माता पिता)
जरन्ता...............वृद्ध (हो रहे हैं)
ता.....................उन दोनो को
युवशा................युवा समान
अकृणोतन...........करो | हे
सौधन्वनाः...........धनुर्विद्या में कुशलो!
अश्वात्...............अश्व से
अश्वम्...............अश्व को
अतक्षत.............बनाओ और
रथम्................रथ को
युक्त्वा................जोड़कर
देवाऩ्................दिव्य पदार्थों को
उप + अयातन.....समीप होकर प्राप्त करो | अथवा
रथं + अयातन.....रथ को जोड़कर विद्वानों के पास जाओ |

व्याख्या

निचर्मणो गामरिणीत धीतिभिः का अर्थ सायणाचार्य्य आदि ने 'गौ' का चमड़ा 'उचेड़ो' ऐसा किया है, किन्तु इस अर्थ की कोई संगति नहीं | हाँ इससे वेद के मत्थे गोहत्या का कलंक अवश्यक लगता है, जो सर्वथा अन्याय है | वेद में गौ को अघ्न्या=न मारने योग्य माना है |सायणादि का अर्थ गां मा हिंसीः (गौ को मत मार) इस वेदवचन का विरोधी भी होता है | सभी ऋषि मुनि मानते हैं कि वेद में 'वदतो व्याघात दोष'=पारस्परिक विरोध नहीं है | फिर यदि श्रीसायणजी का अर्थ 'ठीक हो तो वेदवाक्य 'निश्चर्मणं गामकुरुत' होना चाहिए न कि 'निश्चर्मणो गामरिणीत' चर्म्म से रहित गौ को प्राप्त करो | चर्म से रहित होने पर तो वह गौ ही न रहेगी | इसलिए इस वाक्य का अर्थ कुछ अन्य है |'गौ' शब्द का एक अर्थ वाणी भी है, इस अर्थ को मानकर अर्थ होगा वाणी को चर्म्मरहित करके प्राप्त करो अर्थात बात के मर्म को जानो, जो काल पाकर 'बाल की खाल निकालो' के रूप में आ गया | 'गौ' का एक अर्थ बाल भी है | बाल की खाल निकालने का अर्थ सभी जानते हैं |

इस मन्त्र में उत्तम शिल्पियों को आदेश है | उनका कार्य्य ऐसा है कि जिसमें उन्हें इस बात की आवष्यक्ता है | वे अपनी विद्या के सारे रहस्यों को हस्तगत न करें तो कार्य ही न चले |

दूसरे चरण में उपदेश है कि जो बूढ़े माता पिता हैं, उन्हें जवान बनाओ | ऋग्वेद (1|110|8 ) में भी इसी ढंग की बात की गई है -जिद्री युवाना पितराकृणोतन=वृद्ध माता पिता ‍को युवा कर दो | माता पिता को जवान‌ करने का भाव है कि वे वार्द्धक्य के कष्ट को अनुभव न करें |

तीसरे चरण में कहा है सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत =हे उत्तम शिल्पियो। घोड़े से घोड़ा बनाओ | घोड़े से घोड़ा ही बनता है, पैदा होता है | फिर वेद ने यह बात क्यों कही ? इसका सीधासादा अर्थ है कि घोड़े से उत्तम घोड़ा पैदा करो अर्थात तुम्हारे पशुओं की सन्तान आकार, शक्ति आदि में हीन न होने लग जाए | इस‌ विषय में सावधानता न बर्ती जाए तो उत्तरोत्तर ह्रास होने लगता है |चत्तुर वैज्ञानी मनुष्य ह्रास को रोककर उत्तरोत्तर उत्कर्ष की व्यवस्था करता है |

चौथे चरण में एक आवश्यक व्यवहारिक तत्व का उपदेश है कि शिल्पियों को चाहिए कि वे अपने से उत्कृष्ट विद्वानों की संगति करते रहा करें ताकि शिल्प की उन्नति होती रहे |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)