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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मिलकर बलवान् धूम करो

ओउम्। कृणोत धूमं वृषणं सखायोSस्त्रेधन्त इतन वाजमच्छ
अयमग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवासो असहन्त दस्यून् ||
ऋग्वेद 3|29|9

शब्दार्थ -

हे सखायः...........समान मनोभाव वाले सज्जनो !
वृषणम्..............बलशाली
धूमम्................धूम
कृणोत................करो
अस्त्रेधन्तः............हिंसित न होते हुए
वाजम्................संग्राम में
अच्छ................अच्छी तरंह
इतन................जाओ
अयम................यही
अग्निः...............अग्नि
पृतनाषाट्............फितनो को दबाने वाला, युद्धों में विजय दिलाने वाला तथा
सुवीरः...............बड़े वीरों वाला है, और
येन..................जिसके द्वारा
देवासः...............देव, सदाचारी
दस्यूऩ्...............दस्युओं को
असहन्त.............दबाते हैं |

व्याख्या -
शत्रु से युद्ध करना है | युद्ध के लिये तैयारी करनी होती है | यदि शत्रु से लड़ने के लिये भेजी जाने वाली सेना शत्रु के प्रति उदासीन भाव रखती है, तो वह वीरता से न लड़ेगी | सम्भव है अवसर आने पर शत्रु से मिल भी जाए | इसी प्रकार यदि राष्ट्र के नायक किसी शत्रु के विरुद्ध युद्ध घोषणा करते हैं, किन्तु राष्ट्र‌‌वासी उसके लिए उपेक्षा का भाव रखते हैं तो पराजय कलंक से भाल को दूषित होता देखने के लिए तैयार रहना चाहिए | ऐसे उपेक्षावृति वाले सैनिक तथा राष्ट्र संग्राम में विजय कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते |

विजय के अन्य आवष्यक साधनो के साथ विजयाभिलाषी योद्धाओं के ह्रृदय में शत्रु के प्रति घोर असन्तोष होना चाहिए | वेद इसलिए कहता है -
कृणोत धूमं वृषणं सखायाः = तुम सब मिलकर बलशाली धूम करो | धूम का अर्थ है कंपा देने वाला | राष्ट्र तथा सेना का धूम शत्रु को अवष्य कंपा देगा | यह धूम उत्पन्न करना किसी एक का कार्य नहीं, वरन् सबका कार्य है, अतः सबको मिलकर इसकी उत्पत्ति में यत्नशील होना चाहिए |

राष्ट्र में धूमोत्पादन के कार्य में लगे लोगों के लिए एक शर्त और भी है, वह यह कि वे सखा हों, एक दूसरे के मित्र हों, एक जैसे विचार रखते हों, परस्पर विरोधी नहीं, क्योंकि फूट के शिकार तो मृत्यू के ग्रास बनते हैं | इस कार्य्य में एक और सावधानता भी वर्त्तनी पड़ती है, वह यह कि कहीं इसमे अपनी हानी न हो जाए, अतः वेद का आदेश है -
अस्त्रेधन्त इतन वाजमच्छ - हिंसित न होते हुए संग्राम को भली प्रकार जाओ |

संग्राम में जाने से पूर्व ही यदि हिंसित हो गए, तो संग्राम में क्या युद्ध करेंगे ? अर्थात अपना सब तरंह का बचाव करके संग्राम में जाना चाहिए |नीतिकारों के मत में शुद्धपार्ष्णिः (पीछा जिसका शुद्ध है) होकर युद्ध में जाना चाहिए | ऐसा न हो कि सेना युद्ध में जूझ रही हो और पीछे से प्रक्रृति प्रकोप‌ उठ खड़ा हो, या कोई दूसरा शत्रु आक्रमण कर दे | धूम जब होगा तो अग्नि भी होगी | यह अग्नि ऐसा है कि इससे सारे फसाद, उपद्रव मिट जाते हैं |

यह मन्त्र आध्यात्मिक सूत्र है | आध्यात्मिक अर्थ की कल्पना पाठकों पर छोड़ी जाती है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)