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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

कैसे हों हमारे संकल्प‌

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोSदब्धासो अपरीतास उद्भिदः |
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे ||

ऋग्वेद 1|89|1 || यजुर्वेद 25|14 ||

शब्दार्थ -

नः भद्राः क्रतवः विश्वतः आयन्तु....... हमारे पास श्रेष्ठ ही संकल्प सब तरफ से आवें
अदब्धासः........................जो कि कभी न दबने वाले हों
अपरीतास........................जो कि किसी से घिरे हुए न हों
उद् भिदः...........................और जो उद् भेदन करने वाले हों
यथा देवा नः सदमिद् वृधे असन् ......जिससे कि देवता हमारे लिये सदा उन्नति के लिये होंवें
दिवे दिवे अप्रायुवो रक्षितारश्च असऩ्....और प्रतिदिन प्रमादरहित होकर हमारे रक्षक होवें |

व्याख्या -

"मनुष्य क्रतुमय (संकल्पमय) है, अतः मनुष्य को क्रतु अर्थात संकल्प तथा अध्यवसाय करना चाहिये |" पर वह संकल्प हम किस प्रकार से करें ?

पहले तो हमारे क्रतु (संकल्प) 'भद्राः' होने चाहिये | हम श्रेष्ठ संकल्प ही करें | जो अभद्र संकल्प हैं उन्हें देवता स्वीकृत नहीं करते हैं , अतएव उनसे कुछ बनता नहीं | इसलिए हमारा यह आग्रह हुआ है कि हमारे पास शुभ ही संकल्प आवे, जिससे देवता अर्थात संसार को चलाने वाली ईश्वरीय शक्तियां हमें उन्नत करती रहें | परन्तु संकल्पों के केवल शुभ होने से भी काम नहीं चलेगा, ये हमारे शुभ संकल्प बलवान होने चाहियें | ये 'अदब्ध' होवें, किसी विरोधी शक्ति से दबने वाले न होंवें | और फिर ये संकल्प उद् भेदन करने वाले हों अर्थात मार्ग की सब विघ्न बाधाओं का उद् भेदन करते हुए,सब गुत्थियों को सुलझाते हुए और सब बन्द किवाड़ों को खोलते हुए सफलता तक पहुंचाने वाले हों | हमारे शुभ संकल्पों में ऐसा बल भी चाहिए | और ये संकल्प (परीत‌) पहिले से घिरे हुए भी अर्थात किसी बड़ी अच्छाई के विरोधी भी नहीं होने चाहिए, हमारे संकल्प किसी भी महान सिद्धान्त में दस्तनदाजी करने वाले भी न होने चाहियें | ऐसा होगा तो हमारे संकल्प जगत् के देवों द्वारा प्रतिहत हो जायंगें, मारे जायंगें | इसलिए आज से हममें शुभ और ऐसे बलवान संकल्प ही आवें जिससे कि (इन संकल्पों के ईश्वरीय नियमों के अनुकूल होने के कारण‌) देवता सदा हमारी उन्नति कराते जांय और दिन रात अप्रमाद होकर हमारे रक्षक बने रहें | प्रभु के ये देव तो हमारी उन्नति के लिए ही हैं और निरन्तर बिना भूलचूक हमारी रक्षा करने को तैयार हैं | पर हम ही बड़े बड़े अभद्र स‍कल्प करके या यूं ही निर्बल से बहुत संकल्प करके ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं कि देवों की बड़ी भारी सहायता पाने से अपने आप को वञ्चित कर लेते हैं | इसलिए आज से केवल भद्र निश्चय ही हममें आवें , तथा न दबने वाले, उद् भेदन करते हुए चले जाने वाले और अपरीत, महान भद्र निश्चय ही हम में आवें और चारों और से आवें जिससे कि हम जगत के शासक देवताओं की अनुकूलता में ही सदा बढ़ते हुए जीवन मार्ग पर चलते जांय‌ |

आचार्य अभयदेव विद्यालंकार
(वैदिक विनय से साभार‌)