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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपनिषदों में ब्रह्म‍-विद्या का उद्देश्य‌

वह् ब्रह्म-विद्या क्या है जिसमें प्रवेश की इच्छा कम से कम आस्तिक जगत को रहती है | जिस विद्या में ब्रह्म का वर्णन हो वह ब्रह्म-विद्या कही जाती है | ब्रह्म का वर्णन उसके गुणों द्वारा होता है और उसके गुण वर्णनातीत हैं | फिर उसके समस्त गुणों का ज्ञान किस प्रकार हो सकता है ? यह प्रश्न है जो सदैव ब्रह्म विद्या के विद्यार्थी को चक्कर में डाल देता है | परन्तु उपनिषदों में इसका अच्छा खासा समाधान मिलता है | जब हम कहते हैं कि हम ब्रह्म-विद्या को प्राप्त करना चाहते हैं तो विचारणीय यह है कि इस ब्रह्म-विद्या के प्राप्त करने से हमारा उद्देश्य क्या है ? हमारा उद्देश्य कदापि यह नहीं हो सकता कि हम ब्रह्म की नाप-तोल करना चाहते हैं अपितु एकमात्र उद्देश्य यह होता और हो सकता है कि हम अपनी उन्नति करें | और उन्नति की चरम सीमा यह है कि हम ब्रह्म को प्राप्त कर लें | बस, इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए जिन साधनों की अपेक्षा है उनको प्राप्त करना चाहिए | यदि ब्रह्म के केवल 10 गुणों के जानने से हमारा उद्देश्य पूरा हो सकता है, तो ग्यारहवें गुण के जानने के लिए श्रम करना अनावश्यक है | इसलिए उपनिषदों ने ब्रह्म के केवल उन्हीं गुणों को जान लेने की शिक्षा दी है, जो मनुष्य को उन्नति पथ पर पहुंचा देने के लिए पर्याप्त हैं |

महात्मा नारायण स्वामी जी
(उपनिषद्-संग्रह से)