महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (1)
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्याञ्जगत् |
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा ग्रृधः कस्य स्विद्धनम् ||1||
1. (इदं सर्वम् ) यह सब (यत्किञ्च ) जो कुछ (जगत्याम् ) पृथिवी पर (जगत् ) चराचर वस्तु है (ईशा ) ईश्वर से (वास्यम् ) आच्छादन करने योग्य अर्थात आच्छादित है |
2. (तेन ) उसी ईश्वर के (त्यक्तेन ) दिए हुए पदार्थों से (भुञ्जीथा ) भोगकर |
3. (कस्य स्वित् ) किसी के भी (धनम् ) धन का (मा ग्रृधः ) लालच मत कर |
कुर्वन्नेवेह कर्माणि, जिजीविषेच्छत्ँ समाः |
एवन्त्वयि नान्येतोSस्ति न कर्म लिप्यते नरे ||2||
4. (इह ) यहां (कर्माणि ) कर्मों को (कुर्वन्नेव ) करता हुआ ही (शतं समाः ) सौ वर्ष तक (जिजीविषेत् ) जीने की इच्छा करे (एवम् ) इस प्रकार (त्वयि ) तुझ (नरे ) मनुष्य में (कर्म ) कर्म (न लिप्यते ) नहीं लिप्त होता है (इतः ) इससे (अन्यथा ) भिन्न और कोई मार्ग (न ) नहीं है |
असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाSSवृताः |
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||3||
5. (ये के च ) जो कोई (आत्महनः ) आत्मा के घातक [ आत्मा के विरुद्ध आचरण करने वाले ] (जनाः ) मनुष्य हैं (ते ) वे (प्रेत्य ) मरकर (अन्धेन तमसा ) गहरे अन्धेरे से (आवृताः ) आच्छादित हुए (ते, असुर्य्याः नाम लोकाः ) वे, प्रकाश रहित नाम वाले जो लोक योनियाँ हैं (तान् ) उन (योनियों) को (अभिगच्छन्ति ) प्राप्त होते हैं |
(क्रमशः)
