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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

भगवान सबसे विशाल‌

ओउम् | प्राक्तुभ्य इन्द्रः प्र वृधो अहभ्यः प्रान्तरिक्षात्प्र समुद्रस्य धासेः |
प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः ||

ऋग्वेद 10|89|11

शब्दार्थ -

इन्द्रः..............इन्द्र परमेश्वर
अक्तुभ्यः...........रात्रियों से
प्र...................बहुत
रिरिचे.............अधिक है, विशाल है, और
वृधः...............विशालता के कारण
अहभ्यः...........दिनो से
प्र...................बहुत विशाल है
अन्त‌रिक्षात्........अन्तरिक्ष से
प्र..................बहुत विशाल है
समुद्रस्य..........समुद्र की
धासेः...............धारणशक्ति से, विशालता से
प्र...................बहुत अधिक विशाल है
वातस्य............वायु के
प्रथसः............फैलाव से
प्र...................अधिक है
ज्मः................प्रृथिवि के
अन्तात्............सिर से
प्र...................परे है
सिन्धुभ्यः.........नदियों से, समुद्रों से, बहने वाले तरल Liquid पदार्थों से
प्र...................परे है और‌
क्षितिभ्यः.........रहने के स्थानों से
प्र+रिरिचे.........बहुत अधिक बढ़ा हुआ है |

व्याख्या -

माता जिस प्रकार अतीव स्नेह से बालक को सरलता से ज्ञान कराती है, उसी प्रकार वेदमाता भी अत्यन्त सरलता से बालक को बोध कराती है | काल बहुत विशाल है |काल की कलना कोई न कर सका | दिन रात में बंटा हुआ भी काल अकलनीय ही रहता है | वेद कहता है कालो ह भूतं भव्यं च (अथर्व वेद 19|54|3) = काल ही भूत और भविष्यत् है | जब भूत्-भविष्यकाल है तो कौन कह सकता है कि भूत कितना है ? कौन कहने का साहस कर सकता है कि भविष्यत् कितना है ? वेद कहता है -
प्राक्तुभ्य इन्द्रः प्र वृधो अहभ्यः = इन्द्र अपनी विशालता के कारण रात दिन से बड़ा है | काल की कलना की कल्पना करते विकलता छा जाती है, तो जो काल से विशाल हो उसकी कलना = कल्पना कैसे हो ? वह काल से विशाल प्रभु अप्रतर्क्यपरिमाण अन्तरिक्ष से भी विशाल है =
त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः (अथर्ववेद 1|52|12) = तू इस आकाश लोक से भी परे है अर्थात आकाश का अवकाश भी तेरे सामने कुशकाश है -
न यस्य द्यावापृथिवी अनु वचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः (अथर्ववेद 1|52|14) =
द्यौ, पृथिवी और अन्तरिक्ष जिसकी व्यापक्ता = विशालता का अन्त नहीं पा सकते | वायु तो अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में बहुत थोड़ा स्थान लेता है | उसका पसारा कितना हो सकता है ?

इस मन्त्र का एक भाव और भी है, वह यह कि भगवान इन सब में रहता हुआ भी इन सबसे अतिरिक्त है | रिक्त = प्ररिक्त = अतिरिक्त एक पदार्थ के वाचक हैं | उद्दालक आरुणि के प्रश्न‌ का उत्तर देते हुए याज्ञवाल्क्य ने बहुत सुन्दरता से इसका निरूपण किया है
यः प्रृथिव्यां तिष्ठन् प्रृथिव्या अन्तरो, यं प्रृथिवी न वेद, यस्य प्रृथिवी शरीरं या प्रृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याभ्य‌मृतः (ब्रृहदा, 3/7/3) = जो पृथिवी में रहता हुआ प्रृथिवी से भिन्न है, जिसको प्रृथिवी नहीं जानती, प्रृथिवी जिसका शरीर सा है | जो प्रृथिवी को भीतर से नियमित करता है, वही तेरा अन्तर्यामी आत्मा अमृत है | याज्ञवल्क्यजी ने अन्तर्यामी भगवान को अग्नि, अन्तरिक्ष, वायु, द्यौ, आदित्य, चन्द्र, तारे, आकाश, तमः(अन्धकार‌), तेजः, सर्वभूत, प्राण, वाणी, चक्षु, क्षोत्र, मन, त्वचा, विज्ञान(आत्मा) और रेत में रहता हुआ और उन सबसे अलग बताया है | सबमें रहता हुआ सबसे न्यारा यह तभी हो सकता है, जब सब में रहकर बाहर भी हो | यजुर्वेद 40|5 में कहा है
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः = वह (भगवान‌) इस सबके भीतर भी है और बाहर भी | विशाल संसार की कलप्ना मनुष्य की बुद्धि में नहीं आती, तो उससे महान भगवान के सम्बन्ध में क्या कहा जा सकता है ? सामवेद के शब्दों में इतना ही कहना पर्याप्त है -
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरषः = यह सब भगवान की महिमा = महत्त्व द्योतक है, भगवान इससे बहुत महान है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)