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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

जय-जय हो सत्यार्थ प्रकाश‌ !

सत्यार्थ प्रकाश ! ,वियय यत्रा पर, निकल पड़ा फिर से है आज!
धूम मच गई सब घटकों मे, चहुँदिश फैला फिर उल्लास!
है यह शुभ संकेत विजय का, या प्रभु का हमको वरदान!
आज ऋषि के ऋण से पाया, ऊऋण होने को कुछ त्राण‌
धन्यवाद है उन वीरों को, जिन सबने मिल लहू जलाया
ऋषि की इस परम कृति को, फिर से बन्धन से छुड़वाया
क्योँ ना हूँ आभारी उनका, क्योँ ना शीश झुकाऊँ उनको
परम हर्ष के शुभ अवसर पर, मैँ बलिहारी जाऊँ उन पर‌
आओ आज आर्यवीर‌ मिल, कर लें उन सबका सम्मान!
बढ़ती जाए डोर प्रीत की ,और सत्य की ज्योति महान!
जय भारत, जय ऋषि दयानन्द!
जय-जय हो सत्यार्थ प्रकाश !