सत्य का साक्षात्कार‌

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् |
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्ध्या सत्यमाप्यते ||

यजुर्वेद 19|30 ||

शब्दार्थ‌ -

व्रतेन............व्रत से, सत्यनियम के पालन से मनुष्य
दीक्षां.............दीक्षा को, प्रवेश को
आप्नोति........प्राप्त करता है
दीक्षया...........दीक्षा से
दक्षिणां..........दक्षिणा को, व्रृद्धि को, बढ़ती को
आप्नोति........प्राप्त करता है |
दक्षिणा..........दक्षिणा से
श्रद्धां..............श्रद्धा को
आप्नोति........प्राप्त करता है और सदा
श्रद्ध्या..........श्रद्धा द्वारा
सत्यं...........सत्य को
आप्यते.........प्राप्त किया जाता है |

विनय -

प्यारे क्या तू सत्य को पाने के लिये व्याकुल हो गया है ? तो तू आ, इन चार‌ सीढ़ियों द्वारा तू अवष्य "सत्य" को पा जायेगा | प्रारम्भ में, यदि तुझे सचमुच सत्य से प्रेम हो तो तुझे जहाँ कहीं कोई सच्चा नियम, सत्य नियम, व्रत पता लगेगा तू उसे अवष्य पालन करने लग पड़ेगा | इस तरह व्रतों को जानने और यथाशक्ति पालन करने की तेरी प्रव्रृति तुझे शीघ्र दीक्षा का पात्र बना देगी | दीक्षित होने पर तू पहिली सीढ़ी चढ़ जायेगा | दीक्षित हो जाना मानो सत्य के साम्राज्य में घुसने का प्रवेशपत्र पा लेना है और सत्य के दरबार में पहुंचने का अधिकारी बन जाना है | दीक्षित होने की इस पहिली सीढ़ी पर जब तू चढ़ जावेगा तो तू सत्य के वायुमण्डल में रहने वाला हो जावेगा और तेरा सत्यप्रेमी साथियों का परिवार बन जावेगा | तब तेरे लिये अपने अन्य सत्यपथिक भाइयों के अनुभव से लाभ उठाते हुए सत्यनियमों का जान लेना और उनका यथावत् पालन करना बहुत सहज हो जायेगा | एवं आगे आगे सत्य के पालन में अभ्य‌स्त होता हुआ तू तीसरी सीढ़ी पर भी तब पहुंच जावेगा जब कि तुझे यह स्वात्म-अनुभव हो जावेगा कि सत्य के पालन से तेरी व्रृद्धि (दक्षिणा) होती है, तेरी उन्नति होती है | तब तू स्वयमेव अनुभव करेगा कि सत्य के पालन से तू बलवान और उन्नत हो रहा है | कुछ आश्चर्य नहीं यदि उस समय बाहर का संसार भी तुझे प्रतिष्ठा देता हुआ और तेरे प्रति नानाविध दक्षिणायें लाता हुआ तेरी दक्षता, बलवत्ता और बढ़्ती को स्वीकार करे | तुझे अपने आप तो अपनी व्रृद्धि अनुभूत होगी ही | यह अनुभव ही तुझ‌ में सत्य के लिये श्रद्धा उत्पन्न कर देगा और तुझे श्रद्धा की तीसरी सीढ़ी पर पहुंचा देगा | तब तुझमें सत्य के लिये ऐसी अटल श्रद्धा हो जायेगी कि तू त्रिकाल में भी यह शक नहीं करेगा कि कभी सत्य तेरी हानि भी कर सकता है | श्रद्धा पा जाने पर मनुष्य बड़ी तीव्र गति से आगे बढ़ने लग‌ता है | अतः जब तू अपनी श्रद्धा में मग्न होकर सत्य के - केवल सत्य के - पा लेने के लिये व्याकुल हुआ -हुआ एकग्र होकर अग्रसर हो रहा होगा तो इससे अगली उच्च सीढ़ी पर पैर रखते ही तुझे "सत्य" के दर्शन हो जायेंगे , सत्य का साक्षात्कार हो जावेगा, अपने प्यारे सत्य का साक्षात्कार हो जायेगा |

आचार्य अभयदेव विद्यालंकार
(वैदिक विनय से)

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