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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर‌ टीका से (2)

गतांक‌ से आगे -
व्याख्या -
मनुष्य शक्ति का केन्द्र है | शक्ति उसी के भीतर निहित है | इन्हीं शक्तियों के विकास का नाम शिक्षा है | मनुष्य जीवन की सफलता का भेद यही शक्ति-विकास है | यही शक्ति विकसित होकर अभ्युदय और निःश्रेयस, लोक और परलोक की सिद्धि का कारण बनती है | शक्ति-विकास के कार्यक्रम का ही नाम अध्यात्म-(योग‌) विद्या है| योग कर्म में कुशलता का नाम है, जैसा कि गीता में कहा गया है कि - 'योगः कर्मसु कौशलम् |' महामुनि पतञ्जलि ने भी योग को क्रिया-(कर्म‌) योग ही कहा है और उसके केवल तीन भाग किए हैं -
'तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिध्यानानि क्रियायोगः |' (योगदर्शन 2/1) अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर भक्ति करने ही से योग की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं | सुतराम् क्रिया (कर्म‌) ही योग है | उस क्रिया को करने के लिये सबसे पहला साधन तप है | तप व्रतानुष्ठान को कहते हैं | व्रत नाम कर्तव्य प्रतिज्ञा का है | शक्ति के विकास के लिये जिस तप को करना, जिस व्रत का अनुष्ठान करना या जिस कर्तव्य का पालन करना है उसी का नाम कर्तव्य पंचक है अर्थात क्रियात्मक जीवन बनाने के लिये जिस प्रकार के वातावरण (Atmosphere) के उत्पन्न करने की जरूरत है , वह उन पांच कर्तव्यों के पालन करने से उत्पन्न होता है, जिसका नाम कर्तव्य पंचक है | यह उपनिषद् की आदिम शिक्षा है | इन्हीं कर्तव्यों का पालन करने से किसी भी व्यक्ति को वह अधिकार प्राप्त हुआ करता है, जिसका नाम अध्यात्म विद्या में प्रवेशाधिकार है| इसीलिए उपनिषदों की शिक्षा का वर्णन करने में पहला स्थान इसी कर्तव्य पञ्चक को दिया गया है |

पहला कर्तव्य -

पहली बात यह है कि मनुष्य उच्च प्रकार की आस्तिक्ता के भावों से अपने ह्रृदय को भर ले | इसका साधन यह है कि मनुष्य ईश्वर को परिच्छिन्न (एकदेशीय‌) न मानकर उसे विभु- व्यापक रूप में माने, अर्थात जिस प्रकार प्रत्येक वस्तु आकाश में है और प्रत्येक वस्तु के भीतर भी आकाश है, इसी प्रकार ईश्वर भी जगत् में ओतप्रोत हो रहा है | कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो ईश्वर में न हो और जिसमें ईश्वर न हो | इस सिद्धान्त के आचरण में आने से मनुष्य का ह्रृदय लचकीला हो जाता है| ह्रृदय लचकीला होने के लिए दो बातों की जरूरत होती है | प्रथम वह निष्पाप हो, दूसरे उसमें प्रेम की मात्रा अधिकता से हो | यो दोनो बातें ईश्वर को उपर्युक्त भांति सर्वव्यापक मानने से मनुष्य में आया करती हैं |

मनुष्य पापाचरण के लिये सदैव एकान्त की खोज किया करता है | चोर इसीलिये रात्रि को सफलता का साधन समझता है, क्योंकि उसमें उस प्रकार के एकान्त की अधिक संभावना रहती है, जो ऐसे दुष्ट कर्मों के लिए आवष्यक है | परन्तु ईश्वर का विश्वास होने पर पापाचरण के लिये एकान्त स्थान मिल ही नहीं सकता | एक उर्दू के कवि ने इसी भाव को अपनी एक कविता में इस प्रकार प्रकट किया है

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर |
या वह जगह बता जहाँ पर खुदा न हो ||

अस्तु, जब तक मनुष्य के ह्रृदय में नास्तिक्ता न आये तब तक वह पाप नहीं कर सकता | इसलिए ईश्वर के सर्वव्यापकत्व पर विश्वास होने ही से मनुष्य निश्पाप हो सकता है | दूसरी बात प्रेम है | मनुष्य ईश्वर को सर्वव्यापक मानने से विवश है कि प्रत्येक प्राणी में ईश्वर की सत्ता उसके व्यापकत्व गुण से, स्वीकर करे और जब इस प्रकार प्रत्येक प्राणी में - चाहे वह अछूत है या और कोई उससे भी निकृष्ट- ईश्वर का होना मानेगा तब उससे किस प्रकार घृणा कर सकता है | घृणा का अभाव ही प्रेम का द्वार है | घृणा भी नास्तिक्ता से ही उत्पन्न होती है | जिससे कोई घृणा करेगा, अवश्य उसमें ईश्वर की सत्ता का अभाव मानेगा | इसी का नाम तो नास्तिक्ता है| निष्कर्ष यह है कि निष्पापता और प्रेम से मनुष्यों के हृदय में लचकीलापन (कठोरता का अभाव‌) आया करता है, और इन दोनो साधनों की प्राप्ति ईश्वर के व्यापकत्व पर विश्वास होने ही से हुआ करती है | उपनिषद् ने इस शिक्षा को अपने शब्दों में इस प्रकार प्र्कट किया है -

" ईशा वास्यमिदम् सर्वं यत्किञ्च जगत्याञ्जगत् |

(क्रमशः)