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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर‌ टीका से (3)

गतांक‌ से आगे -
दूसरा कर्तव्य‌ -

उपनिषद् के संक्षिप्त से तीन शब्दों में दूसरा कर्तव्य वर्णन किया गया है | ये शब्द हैं - तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः अर्थात उस (ईश्वर) के दिये हुए से भोग करे | उपनिषदों ने प्रत्येक प्रकार के भोग की आज्ञा दी है | मनुष्य विवाह करके सन्तान उत्पन्न करे, शक्ति प्राप्त करके राज्य प्राप्त करे और उसका उपभोग करे, कृषि व्यापार तथा अन्य कौशलादि से धन प्राप्त करके उसका इस्तेमाल करे इत्यादि | उपनिषद् इन सबको विहित बतलाती है, परन्तु एक शर्त इन सबके भोग के साथ लगाती है और वह यह है कि मनुष्य इन प्राप्त भोग पदार्थों को ईश्वर का समझकर भोग करे |
ऐसे विश्वास से मनुष्य प्रत्येक पदार्थ, राज्य, धनादि को ईश्वर का समझकर उनमें केवल अपना प्रयोगाधिकार समझेगा और ममत्व न जोड़ सकेगा कि 'अमुक पदार्थ मेरा है' | संसार के समस्त दुखों का मूल ममता है | दुख प्रायः किसी न किसी वस्तु के पृथक होने से हुआ करते हैं, परन्तु जब उन्हीं वस्तुओं को मनुष्य स्वयं छोड़ देता है, तब दुख नहीं अपितु सुख हुआ करता है | एक प्रोफेसर को कालिज में अनेक वस्तुएं, पुस्तकें चित्र, कुर्सी, मेज आदि प्रयोग के लिये मिली हुई हैं | वह उनका कालिज के घंटों में प्रयोग करता है | प्रयोग काल (कालिज के घंटों) के भीतर यदि कोई उससे इन वस्तुओं को लेना चाहता है तो नहीं देता, परन्तु जब कालिज का अन्तिम घंटा बजा और उन वस्तुओं के प्रयोग का समय खतम हुआ, तब स्वयं ही इन वस्तुओं को कालिज में ही छोड़कर‌ तने-तनहा चल देता है | उस समय यदि कोई कहता है कि उन वस्तुओं में से वह किसी को अपने साथ लेता जाय तो वह उसे अपने ऊपर बोझ समझता है | प्रोफेसर ने जब इन वस्तुओं के सम्बन्ध में अपना केवल प्रयोगाधिकार समझा, तब उसे इन वस्तुओं को छोड़ने में कुछ भी दुख नहीं हुआ, परन्तु यदि वह इन वस्तुओं में ममता जोड़ देता है कि 'ये वस्तुएं मेरी हैं' तब उसे इन वस्तुओं को छोड़ने में कष्ट अनुभव करना पड़ता है | अस्तु, मनुष्य में जब तक ममता का प्राबल्य रहता है, तब तक वह किसी वस्तु को छोड़ना नहीं चाहता | परन्तु जब उन वस्तुओं में केवल अपना प्रयोगाधिकार समझता है, तब प्रयोग समय समाप्त होने पर स्वयं उन्हें छोड़‌ दिया करता है | वस्तु को छीनने वाले चोर, डाकू, राजे-महाराजे हुआ ही करते हैं, किन्तु एक बड़ी प्रबल शक्ति है, जो गिन गिन कर एक एक वस्तु प्राणियों से ले लिया करती है और कुछ भी नहीं छोड़ा करती | उस शक्ति का नाम है मृत्यु | मृत्यु आकर पदार्थों को छीनती है परन्तु ममता का वशीभूत प्राणी उन्हें देना नहीं चाहता | इसी कलह का नाम मृत्यु वेदना (मरने का दुख ) है | मृत्यु वास्तव में दुखप्रद नहीं सुखप्रद है, परन्तु मरने के समय में ये दुख मनुष्यों को ममता के वश होकर‌ उठाने पड़ते हैं | जो मनुष्य सांसारिक भोग्य पदार्थों में अपना प्रयोगाधिकार समझता है वह इन्हें प्रयोग का समय (जीवन काल आयु) समाप्त होने पर छोड़ देता है और उसके पास कुछ रहता ही नहीं, जिसे मृत्यु आकर अपहरण करे | इसलिये उसके लिये मृत्यु का समय दुख का समय नहीं; अपितु सुख और शान्ति के साथ संसार छोड़ने का होता है, जिसमें उसे आशा और आशा ही नहीं, अपितु विश्वास होता है कि वह यह यात्रा चिरकालीन सुख और शान्ति की प्राप्ति करने के लिये कर रहा है | और ऐसे व्यक्ति मृत्यु से डरते नहीं, अपितु मृत्यु का स्वागत किया करते हैं और प्रसन्नता के साथ हंसते हंसते संसार को छोड़ दिया करते हैं | मृत्यु के सम्बन्ध में जब यह सिद्धान्त दुनिया के सामने रखा जाता है कि वह दुखप्रद नहीं, अपितु सुखप्रद है, तब मनुष्य उसे स्वीकारने में हिचकिचाते हैं |

एक व्यक्ति कुछ रोग से पीड़ित है और उसके शरीर से रक्त और मवाद निकला करता है, जिससे प्रत्येक क्षण उसे व्यथित रहना पड़ता है - इस पर तुर्रा यह कि वह जेलखाने में कैद भी है - किसी प्रकार की स्वतन्त्रता न होने से उसका जीवन दुख और केवल दुखमय बन रहा है | परन्तु ऐसे व्यक्ति से जब यह पूछते हैं कि क्यों भाई, तुम इन सारी विपत्तियों से बचने के लिये मरना चाहते हो ? तो मरने का नाम सुनकर वह भी कानों पर हाथ धरता है | क्रियात्मक जगत में मृत्यु का इतना भय मनुष्यों के हृदय में बैठा हुआ है, फिर वे मृत्यु को किस प्रकार सुखप्रद कह सकते हैं | यही कारण है, जिससे मनुष्य इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में हिचर मिचर करते हैं | परन्तु जैसा कि कहा गया है, यह दुख मनुष्यों को तब होता है जब वे ममता से नाता जोड़ लेते हैं |

एक अत्यन्त रूपवान पुरुष अपना मुँह जब हंसाने वाले शीशे (Ludicrous- Laughing glass) में देखता है, तो उसका अच्छा मुँह भी बहुत भोंडा और हंसने योग्य दिखाई देता है | तो इसमें मुँह का दोष है ? मुँह तो अच्छा खासा है, इसमें दोष असल में उस हास्यकारी शीशे ही का है | इसी प्रकार मृत्यु तो दुःखप्रद नहीं अपितु सुखप्रद ही है | परन्तु जब मनुष्य ममता के आईने को सामने रखकर उसमें उसे (मृत्यु को) देखता है, तब तब वह ड‌रावनी और भयावनी प्रतीत होने लगती है | इससे स्पष्ट है कि दोष मृत्यु का नहीं, किन्तु उसी ममता रूपी हास्यकारी शीशे का है | यदि हम शीशे को हटा कर देखें तो फिर मृत्यु की प्यारी और असली सूरत दिखाई देने लगती है |

मृत्यु के प्रिय होने के सम्बन्ध में डाक्टर हफ लौंसडेल हैंड्स (Dr Hugh Lonsdale Hands) ने आत्मघात द्वारा परीक्षण करके मृत्यु के प्रिय होने की पुष्टि की है | उसने अपनी डायरी में इस प्रकार लिखा है -

I have taken half an ounce of Aconite, an ounce of Chloral Hydrate. Both are nice except the tingling, waiting - feeling very happy - first time I feel without worries as if free + + + Japs are right - death is lovely, I feel fine: no pain.

इसका भाव यह है कि विष खाने के बाद उसने लिखा " प्रतीक्षा कर रहा हूँ । बहुत प्रस‌न्न हूँ । यह पहली बार है
कि मैं अपने को समस्त दुखों से मुक्त अनुभव कर रहा हूँ | जापानी ठीक कहते हैं - 'मृत्यु प्रिय है' | मैं अपने को अच्छा समझ रहा हूँ | मुझे कोई तकलीफ नहीं है |"

सारांश यह है कि इस दूसरे कर्तव्य को पालन करने से मनुष्य मृत्यु के भय से स्वतंत्र होता है | किन्हीं किन्हीं मनुष्यों को यह भ्रम है, या हो जाता है कि यदि मनुष्य सांसारिक पदार्थों - राज्यादि में ममता न जोड़ें तो फिर उनकी रक्षा न कर सकेंगे | परन्तु यह उनकी भूल है | मनुष्य उन वस्तुओं की भी वैसी ही रक्षा उपर्युक्त प्रोफेसर की तरह किया करता है, जो उसे प्रयोग के लिए मिली हों जैसी उनकी करता है जिनमें उनसे मेरेपन का नाता जोड़ा हुआ है | इसलिए लोकदृष्टि से भी यह नियम वैसा ही उपयोगी है जैसा परलोक दृष्टि से मनुष्य मृत्यु के भय से स्वतन्त्र होकर संसार में कौन सा बड़े से बड़ा काम‌ है, जिसे नहीं कर सकता |

(क्रमशः)