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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर‌ टीका से (4)

गतांक‌ से आगे -
तीस‌रा कर्तव्य‌

बिना शान्ति का वातावरण उत्पन्न किये संसार का कोई भी कार्य पूरा नहीं होता, फिर अध्यात्म विद्या का तो कहना ही क्या, उसे तो कोई अशांति में या अशांत चित्त होकर प्राप्त ही नहीं कर सकता | अशांति का मूल कारण किसी व्यक्ति या जाति का स्वत्व अपहरण ही हुआ करता है |

दुनिया में भिन्न भिन्न जातियों में जितने भी युद्ध हुआ करते हैं, उनका मुख्य कारण यही होता है कि किसी जाति का स्वत्व छीना गया या उसकी स्वतन्त्रता में बाधा पहुंचाई गई हो | यही कारण व्यक्ति व्यक्ति के झगड़ों की तह में छुपा हुआ मिलता है | इसलिए 'कारणाभावात्कार्य्याभावः' के नियमानुसार उपनिषदों ने तीसरा कर्त्तव्य यह ठहराया है कि 'मा गृधः कस्य स्विद्धनम्' अर्थात किसी के धन अथवा स्वत्व को लेने की चेष्टा मत करो | न किसी का धन लिया जायगा, न किसी का स्वत्व छीना जायगा, न किसी की स्वतन्त्रता में बाधा पहुंचाई जायेगी और न उनकी संतति, अशान्ति का जन्म होगा |

चौथा कर्त्तव्य

उपनिषद् ने चौथा कर्त्तव्य इन‌ शब्दों में बतलाया है कि कर्म करते हुए ही मनुष्य 100 वर्ष तक‌ जीने की इच्छा करे | परन्तु शर्त यह है कि कर्म इस प्रकार से करने चाहियें, कि वे करने वाले को लिप्त न करें, अर्थात मनुष्य उनमें फंस न जाये | उपनिषद् ने खुले शब्दों में यह भी कह दिया कि मनुष्य को जीवित रहने के लिए इस (कर्मयोग‌) के सिवाय कोई दूसरा मार्ग नहीं है |

यह कर्त्तव्य दो भागों में विभक्त है - (1) मनुष्य को निरन्तर कर्म करने का अभ्यास करना चाहिए, (2) वे कर्म कर्त्ता को फंसाने वाले न हों |

पहले भाग पर दृष्टिपात करने से प्रकट होता है कि 'कर्म' सृष्टि का सार्वत्रिक नियम है | जगत में कोई वस्तु ऐसी दिखाई नहीं देती कि जो क्रिया रहित हो | सृष्टि का महान से महान कार्य सुर्य प्रतिक्षण गति में रहता है | पृथ्वी गतिमय है, चन्द्रमा चलता है | यदि छोटी-से-छोटी वस्तु एक कण (Atom) को लें और देखें तो एक बड़ा चमत्कार दिखाई देता है | उस कण के भीतर एक केन्द्र है और उसके चारों और अनेक विद्युत्कण (Electrons) उसी प्रकार घूमते दिखाई देते हैं, जिस प्रकार अनेक ग्रह और उपग्रह सूर्य के चारों और घूमते हैं | इसी प्रकार ब्रह्माण्ड का एक एक कण भी सूर्य मण्डल (Solar System) का संक्षिप्त रूप है | क्या यह कण जिसके भीतर इतना कार्य हो रहा है ठहरा हुआ या निष्क्रिय है ? विज्ञान का यह उत्तर‌ है कि कदापि नहीं | यह पुस्तक जो सामने मेज पर रखी है, क्या ठहरी हुई है ? कदापी नहीं | पुस्तक के पृष्ठ जिन कणों से बने हैं, उनमें से प्रत्येक कण में कम्पन (Vibrations) पाया जाता है | यदि कम्पन न हो तो कोई वस्तु वस्तुरूप में बाकी न रहे | इससे स्पष्ट है कि जगत् की छोटी से छोटी वस्तु कण है, जिसके भीतर गति हो रही है, और जो स्वयं भी सूर्य मण्डल की तरह गति में है | जब कर्म का साम्राज्य जगद्व्यापी है, तो मनुष्य उससे किस प्रकार बच सकता है ? इसलिए मनुष्य को भी कर्मनिष्ठ होना चाहिए | उपनिषद् का उपर्युक्त वाक्य जीवन की अन्तिम घड़ी तक कर्म करने का विधायक है | संन्यास, कर्म के त्याग को अवष्य कहते हैं, परन्तु कर्म से प्रयोजन काम्य (सकाम‌) कर्म यज्ञादि से है, और उन्हीं का त्याग संन्यास है, निष्काम कर्म तो कभी भी नहीं छोड़े जा सकते |

कर्तव्य का दूसरा भाग यह है कि मनुष्य कर्म करने में लिप्त न हो | कर्त्तव्य के इस भाग को समझने के लिए आवष्यक है कि यह समझ लिया जावे कि कर्म दो प्रकार के हैं (1) सकाम और (2) निष्काम | निष्काम कर्म , फल की इच्छा त्याग कर, धर्म (कर्त्तव्य) समझकर, कर्म करने को कहते हैं | इन दोनों में अन्तर यह है कि सकाम कर्म से वह वासना उत्पन्न होती है. जो फिर उसी प्रकार के कर्म की प्रेरणा भीतर से करती रहती है | योगदर्शन का भाष्य करते हुए व्यास मुनि ने एक संसार चक्र की बात कही है | वह चक्र 6 अरे वाला है | वे अरे ये हैं - मनुष्य इच्छा करता है इसका फल उसे सुख मिलता है, उससे सुख की वासना बनती है | वह फिर उसी प्रकार की इच्छा करती है | उससे फिर सुख, फिर वही वासना, फिर वही इच्छा | इस प्रकार (1) इच्छा, (2) उसका फल सुख, (3) सुख की वासना, ये चक्र के तीन अरे हैं, जो बराबर उपर्युक्त भांति घूमा करते हैं | बाकी तीन अरे (1) द्वेष (2) उसका फल दुख, (3) दुख की वासना हैं | वे भी पहले तीन अरों की भांति घूमा करते हैं | यही छः चक्रों वाला संसार चक्र है, जो संसारी पुरुषों को चक्र में रखता है | इसी चक्र में रहने का नाम कर्म में मनुष्य का, या कर्म का मनुष्य में लिप्त होना है | उपनिषद् मनुष्यों का कर्त्तव्य ठहराती है कि कर्म करते हुए भी इस चक्र में न फंसें | फंसे हुए प्राणी इस चक्र से किस प्रकार निकल सकते हैं, उसका उपाय और एकमात्र उपाय सकामता का निष्कामता में परिवर्तन करना है | इस परिवर्तन से प्रभावित मनुष्य निष्काम कर्म करके वासनाओं का नाश‌ करता है | उनके न रहने से सब सुख-दुख भी पृथक् हो जाते हैं और सुख-दुख के न रहने से उनकी वासनाएं भी नहीं बन सकतीं और इस प्रकार चक्र के छहों अरे निक्कमे होकर चक्र टूट जाता है और मनुष्य उससे निकल आता है | यही चौथा कर्त्तव्य है, जिसके पालन किए बिना व्यक्ति अध्यात्म जगत् में प्रवेश का अधिकारी नहीं बन सकता |

(क्रमशः)