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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

नेता बनने के साधन‌

ओउम् । भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः |
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम् ||

यजुर्वेद 15-23

शब्दार्थ‌ -

यज्ञस्य..............(तू) यज्ञ का
च.......................तथा
रजसः..................संसार का
नेता....................नेता
भुवः....................होगा,
यत्र.....................जब तू
शिवाभिः.................कल्याणमयी
नियुद्भिः..................नीतियों से
सचसे....................संयुक्त होगा |
मूर्धानम्................सिर को
दिवि.....................द्यौ में, प्रकाश में
दधिषे....................धारण करेगा और‌
स्वर्षाम्.................उत्तम‌गतिवाली, मधुर
जिह्वाम्.................जिह्वा को
हव्यवाहम्..............भोग प्राप्त करानेवाली
चकृषे..................करेगा |

व्याख्या -

इस मन्त्र में नेता बनने के निम्न उपाय बताये गये हैं -

(1) यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः = जब कल्याणकारी नीतियों, युक्तियों से युक्त होगा | नेता बनने के अभिलाषी को पहले अपना व्यवहार सँवारना चाहिए | उसका व्यवहार ऐसा हो जिससे सबका भला हो | भाव यह है कि उसे सदा अपने अनुगतों की प्रत्येक आवष्यक्ता तथा उसकी पूर्ती के साधन ज्ञात होने चाहिएँ |

(2) दिवि दधिषे मूर्धानम् = सिर आसमान पर रखे | इसका भाव यह नहीं कि वह अभिमान करे ; प्रत्युत यह कि अपने ज्ञानादि गुणों के कारण वह सबसे ऊँचा हो | यदि नेता योग्यता में कम हुआ तो उसका नेतृत्व चल नहीं सकेगा | वह आसमान में सिर तभी रख सकेगा, जब उसे ज्ञानी गुरुओं के चरणों में रखने का अभ्यस्त होगा |

(3) स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम् = अपनी मधुर वाणी को भोग प्राप्त करने वाली बनाये | वाणी की मिठास सबसे आवष्यक है | नेता के लिये तो कहना ही क्या । मनु जी ने कहा है -

अहिंसयैव भूतानां कार्य्य श्रेयोSनुशासनम् |
वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता || मनु. 2-159

धर्माभिलाषी को प्राणियों का अनुशासन अहिंसापूर्वक ही करना चाहिए और वाणी मधुर और श्लक्ष्ण-सुथरी ही प्रयोग करनी चाहिए | केवल मीठी और चिकनी चुपड़ी बातों से ही दूसरों को नहीं टाल देना चाहिए, प्रत्युत वह स्वर्षा=मधुर या सुखदायी वाणी, 'हव्यवाट्' भी होनी चाहिए | नीतिकार कह गये हैं -
निरत्ययं साम न दानवर्जितम् = निर्बाध सान्त्वना दान के बिना व्यर्थ है अर्थात जहाँ मीठी मीठी बातें बनाओ, वहां वास्तव में भी कुछ करके दिखाओ | ऋग्वेद (10|38|4) में 'रक्षक' के सम्बन्ध में कुछ ऐसे ही भाव हैं -

यो दभ्रेभिर्हव्यो यश्च‌ भूरिमिर्यो अभीके वरिवोविन्नृषाह्मे |
तं विखादे सस्निमद्य‌ श्रुतं नरमर्वाञ्चमिन्द्रमवसे करामहे ||

जिसे छोटे बुला सकें, बड़े बुला सकें, जो दूरस्थ, मनुष्य से सहनयोग्य कार्य्य में विधान का ज्ञान‌ रखता हो, विपत्ति के समय ऐसे अतिशय शुद्ध विद्वान्, सरल ऐश्वर्य्य‌सम्पन्न नेता को हम रक्षा के लिए नियुक्त करते हैं |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)