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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर‌ टीका से (5)

गतांक‌ से आगे :
पाँचवां कर्तव्य -

उपनिषद में पांचवें कर्त्तव्य का विधान इस प्रकार किया गया है -

आत्म-हनन (आत्मा के विपरीत काम) करने वाले मर कर असूर्य (प्रकाश-रहित) और तम से आच्छादित योनियों को प्राप्त होते हैं |

मन्त्र में आत्म-हनन अर्थात आत्मा के प्रतिकूल कार्य को निषिद्ध ठहराया गया है | आत्मा के प्रतिकूल कार्य नहीं करना चाहिए, इस पर विचार करना है | आत्मा स्वरूप से शुद्ध और पवित्र है, किसी प्रकार के ईर्ष्या-द्वेषादि दोषों से लिप्त नहीं | इसलिए आत्म-प्रेरणा भी, जिसको अन्त:करण के अनुकूल कार्य करना (काँन्शन्स = Conscience) कहते हैं, इन दोनो से मुक्त होती है | इसीलिए धर्मशास्त्रकार मनु ने भी इसी आत्म-प्रेरणा को 'स्वस्य च प्रिय‌मात्मनः' कह कर धर्म का अन्तिम साधन बतलाया है |

चरित्र निर्माण करने का मुख्य साधन भी यही आत्म-प्रेरणा है | चरित्रवान हुए बिना मनुष्य अध्यात्म जगत में प्रवेश नहीं कर सकता | इसीलिए उपनिष्द् में इस बात पर विचार करते हुए कि कौन कौन मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते उसकी गणना में सबसे पहिला नाम चरित्रहीनों का लिया है
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः | (कठोपनिषद् 1|2|4) | आत्म-प्रेरणा से किस प्रकार चरित्र निर्मित होता है इसके लिए किसी विशेष व्याख्या की जरूरत नहीं है | चरित्र को ही सदभ्यास भी कहते हैं | अभ्यास एक ही कर्त्तव्य को अनेक बार कार्य परिणित करने से बना करता है | मनुष्य जब कोई अच्छा या बुरा काम करना चाहता है तो अच्छा काम करने में आत्म-प्रेरणा से उसको उत्साह और प्रसन्नता उत्पन्न होती है परन्तु जब बुरा काम करने का विचार करता है, तो उसके सम्मुख भीतर से भय, लज्जा और शंका के रूप में अनुत्साह और अप्रसन्नता पैदा होती है | पहली सूरत में किसी अच्छे कर्म को अनेक बार करके प्राणी उसको करने का अभ्यास बना लेता है और फिर उस काम को वह इच्छा से नहीं किन्तु अभ्यासवश किया करता है | इसका नाम सदभ्यास या चरित्र‌ है | इसी प्रकार जब कुसंगति में पड़कर कुसंग दोश से आत्म प्रेरणा के विरुद्ध मनुष्य कोई बुरा काम अनेक बार कर लेता है, तो उससे असदभ्यास बनता है और इससे वह वह उस बुराई को भी बिना इच्छा के किन्हीं सूरतों में इच्छा के विरुद्ध भी अभ्यासवश करने लगता है | कल्पना करो कि एक मनुष्य ने अफीम खाने का बुरा अभ्यास बना लिया है | अब जब दूसरे पुरुष‌ उसको इस दुष्कर्म की दुष्कर्मता बतलाते हैं तो वह उन्हें स्वीकार कर लेता है परन्तु जब कहते हैं कि फिर उन्हें छोड़ क्यों नहीं देते तब वह अपनी विविशता प्रक‌ट करते हुए कह देता है कि क्या करूँ ? आदत से लाचार हूँ |

इस प्रकार विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि अत्म प्रेरणा से सदभ्यास या चरित्र बना करता है और उनके विरुद्ध आचरण करने से असद्भ्यास या दुश्चरित्र | हमने देख लिया कि आत्मा के अनुकूल ही कार्य करके हम चरित्र‌ निर्माण करते हुए आत्म जगत् में प्रवेषाधिकार प्राप्त कर सकते हैं | पश्चिमी विद्वानों ने भी उपनिषद् की सचाई के साम‌ने सिर झुकाया है | इंगलैंड के प्रसिद्ध विद्वान मारले ने एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है 'राजीनामा' (Compromise)| इस पुस्तक में इस बात पर विचार किया गया है कि किन सूरतों में राजीनामा हो सकता है ? उसने सम्मति के तीन दरजे किये हैं -
(1) सम्मति का स्थिर करना |
Formation of opinion.
(2) सम्मति का प्रकट करना |
Expression of opinion.
(3) सम्मति का कार्य में परिणित करना |
Execution of opinion.

इस प्रकार सम्मति के तीन दरजे करते हुए मारले ने लिखा है कि सम्मति के स्थिर करने में कोई राजीनामा नहीं हो सकता | हाँ, कुछ थोड़ा सा राजीनामा सम्मति के प्रकट करने (संख्या 2) में हो सकता है और वह केवल इतना कि जिस सम्मति के प्रकट करने में दुष्परिणामों के निकलने की सं‍भावना हो उस सम्मति को प्रकट न किया जाय | यह वही बात है जिसे मनु ने " न ब्रूयात् सत्यमप्रियम " के द्वारा प्रकट किया है | मारने की सम्मति में पूरा पूरा राजीनामा सम्मति के कार्य में लाने (संख्या 3) ही में हो सकता है, अर्थात अल्पपक्ष की सम्म‌ति की उपेक्षा करके बहुपक्ष के मतानुकूल कार्य किया जाय | परन्तु उसकी यह स्थिर सम्मति है कि सम्मति के स्थिर करने (संख्या 1) में किसी दशा में कोई राजीनामा नहीं हो सकता | सम्मति का स्थिर करना क्या है ? आत्म प्रेरणानुकूल किसी विचार का स्थिर करना | अतः यह स्पष्ट है कि मारले ने भी आत्म प्रेरणा के विरुद्धाचरण का विधान नहीं किया है | कर्त्तव्य पंचक में से यह पांचवां कर्तव्य है - 'आत्मा के अनुकूल कार्य करना'|

इस प्रकार उपनिषदों ने सबसे पहली बात आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए यही बतलाई है कि मनुष्य इन पाँचों कर्त्तव्यों को समझकर इन पर आचरण करे | वे पांचों कर्त्तव्य हैं | ऊपर लिखे, एक बार फिर उन्हें दोहरा देते हैं :-

(1) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ईश्वर को सर्वव्यापक मानना |

(2) जगत् के भोग्य पदार्थों में ममता को न जोड़कर अपना प्रयोगाधिकार समझना |

(3) किसी की वस्तु या स्वत्व का अपहरण न करना |

(4) सदैव कर्म करना, उन्हें निष्कामता को लक्ष्य में रखकर धर्म‌ या कर्त्तव्य समझ कर करना |

(5) आत्मा के अनुकूल मन , वाणी और शरीर से आचरण करना |

(क्रमशः)