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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आहुति का समय‌

उत्तिष्ठत अवपश्यत इन्द्रस्य भागमृत्वियम् |
यदि श्रातं जुहोतन यद्यश्रातं ममत्तन ||

ऋ. 10|179|1 ; अथर्व. 7|72|1 ||

श‌ब्दार्थ -

उत्तिष्ठत.................उठो, खड़े होओ
अवपश्यत...............और सावधानी से देखो,
इन्द्रस्य.................इन्द्र के
ऋत्वियं.................ऋतु ऋतु के अनुकूल, समय समय पर दिये जाने वाले
भागं......................हवि के, बलिदान के भाग को देखो |
यदि......................यदि
श्रातं......................[यह हवि] पक चुकी है तो
जुहोतन..................इसका हवन कर दो, और
यदि......................यदि
अश्रातं....................पकी नहीं है तो
ममत्तन..................[ठहरो, दुखी मत होओ] प्रसन्न होकर इसे और पकाते जाओ |

विनय -
हे मनुष्यो ! उठो, देखो कि इस समय इन्द्र की कौन सी आहुति का समय है | यह काल-इन्द्र समय समय पर संसार से भारी-भारी आहुतियां मांगता है, और इसी से यह संसार उन्नत होता है | यह देश-इन्द्र समय समय पर बड़े बड़े बलिदान चाहता है, और इस बलिदान को पाकर ही यह अपने एक बड़े अभ्युत्थान के पग को आगे उठा सकता है | और हम इस जीवात्मा-इन्द्र के लिये समय समय पर आत्म-बलिदान करते हुए, ऋतु-ऋतु के अनुकूल इसका यजन हवन करते हुए, बल्कि एक दिन के भी भिन्न-भिन्न समयों पर उस उस समय के अनुकूल उसको उसके अन्न,ज्ञान आदि हवि का भाग प्रदान करते हुए चलते हैं तभी हम आत्मोन्नति को पा सकते हैं | इसलिये हमें सदा खड़ा रहना चाहिये, जागते रहना चाहिये, और खड़े होकर सावधानी से देखते रहना चाहिये कि कहीं किसी आहुति का समय तो नहीं आ गया है, कहीं संसार को, देश को या अपने आत्मा को हमारे किसी बलिदान की जरूरत तो नहीं आ गयी है | देखना यदि हम प्रमाद के कारण समय को चूक जायंगे, जिस समय बलिदान करना चाहिये, उस समय बलिदान न कर सकेंगे तो हम न केवल उन्नति से वंचित हो जायंगे किन्तु बहुत पिछड़ जायंगे, पतित हो जायंगे, अवनति के गर्त में गिर जायंगे | अतः उठो और देखते रहो कि कहीं इन्द्र का भाग देने की ऋतु तो नहीं आ गयी है |

परन्तु आहुति सदा पकी हुई ही देनी चाहिये, कच्ची आहुति से कुछ फल नहीं होता किन्तु हानि ही होती है | जैसे कि वृक्ष से बिना पके गिरा हुआ फल किसी काम नहीं आता बल्कि खाने वाले को नुकसान पहुँचाता है, उसी तरह अपने आपको बिना पकाये जो यों ही जोश में आकर बलिदान कर दिया जाता है उससे कुछ नहीं बनता बल्कि बहुत बार वह आत्म-घात रूप होता है | अतः यदि आहुति पकी हुई हो तब तो उसका हवन कर दो, यदि न पकी हो तो ठहर जाओ | इसके लिये दुखी मत होओ | यदि तुम आहुति के समय तक इसे नहीं पका सके तो अब दुखी होने से क्या फायदा ? अब तो प्रसन्न होकर इसे फिर पकाओ, पकाते जाओ जिससे कि अगले आहुतिकाल में तुम इसे जरूर दे सको, अगले बलिदान के समय तक तुम जरूर पके हुए होओ |

आचार्य अभयदेव विद्यालङ्कार
(वैदिक विनय)

मृत्युलोक

मृत्युलोक मे विचरण करते शिवजी को एक दिन डरे सहमेँ दौडते बच्चे दिखाई दिये।पता चला खेल के मैदान मेँ एक भयंकर विषैला सर्प रहता है जो आये दिन किसी को काट लेता है।शिवजी ने सांप को समझाया और आगे चले गये।वापस लौटे तो देखा वही सांप उसी मैदान मेँ पडा अंतिम सांसेँ ले रहा है।पूछने पर सांप बोला आपने ही तो काटने से मना किया था।शिवजी बोले रे मूर्ख तुझे काटने से ही तो मना किया था।अपनी रक्षा हेतु फुफकारने से तो नही रोका था।हिन्दुओँ ने सुना अहिँसा परमो धर्मः।पर जिस अहिँसा का आज प्रदर्शन हो रहा है वह अहिँसा नही बल्कि हिजडापन है।अपनी कायरता को क्षमाशीलता का लबादा ओढाने का नाम अहिँसा नही है।किसी अत्याचारी का वध करना हिंसा नही होती।अगर इसे हिंसा कहते हो तो आज से राम और कृष्ण को पूजना बंद करो।क्योँकि उनके द्वारा किये गये संहारोँ की तो गणना नही है।देश धर्म के दुश्मनोँ का वध करना पाप नही पुण्य कार्य होता है।राम कृष्ण की संतानोँ उठो और अपने पूर्वजोँ तथा संस्कृति का अपमान करने वालोँ को सबक सिखाने को तैयार हो जाओ।और कह दो कि-हमको मिटा सके जमाना जमाने मेँ दम नही,हम से है जमाना जमाने से हम नही।शेष फिर कभी रविन्द्र आर्य

रविन्द्र

रविन्द्र जी, बहुत अच्छा लिखा आपने |

शायद

शायद इसीलिए हमारे देश में अब आहूति केवल सैनिक ही देते हैं बाकी सब तो मौज उड़ाते फिरते हैं, पूरी सिक्योरिटी को अपने आगे पीछे लगाए | जब तक एक एक बच्चा बूढ़ा तक न जाग जाए, अपने अपने कार्य में पूरी श्रद्धा से, तब तक इन नेताओं का फुफकारना भी केवल दिखावा मात्र होगा | पर यह तभी संभव होगा जब कोई वीर आकर इस देश की बागडोर‌ सम्भाले, जो स्वयं व सबको सही मार्ग पर चला सके| आशा है जल्द ही वह युग फिर लौटेगा |