Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ऋषि दयानन्द के चरणों में "सादर समर्पण‌" - स्वामी श्रद्धानन्द‌

ऋषिवर ! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे 41 वर्ष हो चुके, परन्तु तुम्हारी दिव्य-मूर्ति मेरे ह्रदय पट पर अब तक ज्यों की त्यों अंकित है | मेरे निर्बल ह्रदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है | तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है, परमात्मा के बिना, जिनकी पावन गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है ? परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे सहवास ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठा कर सच्चा लाभ करने के योग्य बनाया ?

मैं क्या था इसे कहानी में मैने छुपाया नहीं | मैं क्या बन गया और अब क्या हूं | वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है | इसलिए इससे बढ़कर मेरे पास तुम्हारी जन्म शताब्दि पर और कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करूं | तुम वाणी द्वारा प्रचार करने वाले तत्त्ववेत्ता ही नहीं थे परन्तु जिन सच्चाइयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था | भगवान कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रह गया था, परन्तु तुमने मानव संसार को सीधा मार्ग दिखलाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की |

भगवन् ! मैं तुम्हारा ऋणी हूं, उस ऋण से मुक्त होना चाहता हूं | इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानन्द का अनुभव कर रहे हो, उसी से प्रार्थना करता हूं कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ती प्रदान करे |

विनीत

श्रद्धानन्द
(कल्याण मार्ग का पथिक)