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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर‌ टीका से (6)

गतांक से आगे :

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् |
तद्वावतोSन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||4||

भाषार्थ -
वह (ब्रह्म)
अनेजत..................अचल, एकरस
एकम.....................एक
मनसो जवीयः.............मन से अधिक वेगवाला है क्योंकि सब जगह
पूर्वम्.....................पहले से
अर्षत.....................पहुँचा हुआ है |
एनम्.....................उस ब्रह्म को
देवाः.......................इन्द्रियां
न आप्नुवऩ्...............नहीं प्राप्त होतीं, अर्थात वह इन्द्रियों से, उन
(इन्द्रियों) का विषय न होने के कारण प्राप्त नहीं होता |
तत्........................वह
तिष्ठत्.....................अचल होने पर भी
धावतः.....................दौड़ते हुए
अन्याऩ्....................अन्यों को
अत्येति....................उल्लंघन किये हुए है,
तस्मिऩ्....................उस ब्रह्म के भीतर
मातरिश्वा...................वायु
अपः.......................जलों को (मेघादि के रूप में)
दधाति......................धारण करता है |

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके |
तदन्तरस्य सर्वस्य त सर्वस्यास्य बाह्यतः ||5||

भाषार्थ -

तत्........................वह ब्रह्म
एजति.....................गति देता है
तत्........................परन्तु स्वयं
न एजति..................गति में नहीं आता
तत्........................वह
दूरे.........................दूर है,
तत् उ अन्तिके............वह समीप भी है |
तत्........................वह
अस्य,सर्वस्य,,अन्तः,बाह्यतः..इन सब के अन्दर और बाहर भी है |

यन्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति |
सर्वभूतेषु चात्त्मानं ततो न विजुगुप्सते ||6||

भाषार्थ -

यःतु.......................जो कोई
सर्वाणि.....................सम्पूर्ण
भूतानि.....................चराचर जगत् को
आत्मनि, एव..............परमेश्वर ही में
अनुपश्यति..................देखता है,
च..........................और
सर्वभूतेषु....................सम्पूर्ण चराचर जगत् में
आत्मानम्.................परमेश्वर को देखता है |
तत्.........................इससे वह
विजुगुप्सते..................निन्दित नहीं होता |

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः |
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: ||7||

भाषार्थ -

यस्मिन.....................जिस अवस्था में
विजानतः....................विशेष ज्ञानप्राप्त योगी की दृष्टि में
सर्वाणि भूतानि..............सम्पूर्ण चराचर जगत
आत्मा, एव................परमात्मा ही
अभूत्.......................हो जाता है
तत्र..........................उस अवस्था में ऐसे
एकत्वम्, अनुपश्यतः........एकत्व देखने वाले को
कः मोहः....................कहाँ मोह
कः शोकः...................और कहाँ शोक ?

स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर‌ँ शुद्धमपापविद्वम् |
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोSर्थान् व्यदधा
च्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ||8||

भाषार्थ -

सः...........................वह ईश्वर
परि, अगात्..................सर्वत्र व्यापक है,
शुक्रम्........................जगदुत्पादक,
अकायम्.....................शरीर रहित,
अव्रणम्......................शारीरिक विकार रहित,
अस्नाविरम्..................नाड़ी और नस के बन्धन से रहित,
शुद्धम्........................पवित्र,
अपापविद्वम्..................पाप से रहित
कवि..........................सूक्ष्मदर्शी
मनीषी........................ज्ञानी,
परिभूः........................सर्वोपरि वर्तमान,
स्वयम्भूः......................स्वयंसिद्ध
शाश्वतीभ्यः..................अनादि
समाभ्यः....................प्रजा (जीव) के लिए
याथातथ्यतः................ठीक ठीक
अर्थाऩ्........................कर्म फल का
व्यदधात्....................विधान करता है |

व्याख्या -

कर्त्तव्य‌ पंचक का विवरण दिया जा चुका है | उस विवरण में कहा गया था कि इन पाँच कर्त्तव्यों का पालन करने से मनुष्य ब्रह्म-विद्या में प्रवेशाधिकार प्राप्त कर लेता है | अब प्रश्न यह है कि वह ब्रह्म विद्या क्या है कि जिसमें प्रवेश की इच्छा कम से कम आस्तिक जगत को रहती है | जिस विद्या में ब्रह्म का वर्णन हो वह ब्रह्म-विद्या कही जाती है | ब्रह्म का वर्णन उसके गुणों द्वारा होता है और उसके गुण वर्णनातीत हैं | फिर उसके समस्त गुणों का ज्ञान किस प्रकार हो सकता है ? यह प्रश्न है जो सदैव ब्रह्म विद्या के विद्यार्थी को चक्कर में डाल देता है | परन्तु उपनिषदों में इसका अच्छा खासा समाधान मिलता है | जब हम कहते हैं कि हम ब्रह्म-विद्या को प्राप्त करना चाहते हैं तो विचारणीय यह है कि इस ब्रह्म-विद्या के प्राप्त करने से हमारा उद्देश्य क्या है ? हमारा उद्देश्य कदापि यह नहीं हो सकता कि हम ब्रह्म की नाप-तोल करना चाहते हैं अपितु एकमात्र उद्देश्य यह होता और हो सकता है कि हम अपनी उन्नति करें | और उन्नति की चरम सीमा यह है कि हम ब्रह्म को प्राप्त कर लें | बस, इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए जिन साधनों की अपेक्षा है उनको प्राप्त करना चाहिए | यदि ब्रह्म के केवल 10 गुणों के जानने से हमारा उद्देश्य पूरा हो सकता है, तो ग्यारहवें गुण के जानने के लिए श्रम करना अनावश्यक है | इसलिए उपनिषदों ने ब्रह्म के केवल उन्हीं गुणों को जान लेने की शिक्षा दी है, जो मनुष्य को उन्नति पथ पर पहुंचा देने के लिए पर्याप्त हैं |
सबसे पहिली शिक्षा ब्रह्म के विषय में यह है कि तुम उसे व्यक्ति रूप में न मानकर समष्टि रूप में मानो, अर्थात वह विभु है, परिच्छिन्न नहीं है, सर्वदेशी है,एकदेशी नहीं |इस बात का मानना उपनिषद् ने इतना अधिक आवश्यक समझा है कि इसको अनेक अनेक रीति से वर्णन किया है | हम उसका यहाँ थोड़ा सा विवरण देते हैं :-

(क्रमशः)