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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (1)

ओउम्
तत्सत्पर‌ब्रह्मणे नमः
अथर्याभिविनयप्रारम्भः
श‌ं नो मित्राः शं वरुणः शं नो भवत्वर्य्यमा |
श‌ं न इन्द्रो बृहस्पतिः श‌ं नो विष्णुरुरुक्रमः ||1||

ऋ. अ. 1|अ.6|व.18|म.9||*
*अष्टक, अध्याय, वर्ग, मन्त्र

व्याख्यान -

हे सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, हे नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, हे अद्वितीयानुपमजगदादिकारण, हे अज निराकार, सर्वशक्तिमन्, न्यायकारिन्, हे जगदीश, सर्वजगदुत्पादकाधार, हे सनातन, सर्वमङ‌लमय, सर्वस्वामिन, हे करुणाकरास्मत्पितः परमसहायक, हे सर्वानन्दप्रद‌, सकलदुःखविनाशक, हे अविद्यान्धकारनिर्मूलक, विद्यार्कप्रकाशक, हे परमएश्वर्यदायक, साम्राज्यप्रसारक, हे अधमोद्धारक, पतितपावन, मान्यप्रद, हे विश्वविनोदक, विनयविधिप्रद, हे विश्वासविलासक, हे निरञ्ज‌‌न, नायक, शर्मद, नरेश, निर्विकार, हे सर्वान्तर्यामिन्, सदुपदेशक, मोक्षप्रद, हे सत्यगुणाकर, निर्मल, निरीह, निरामय, निरुपद्रव, दीनदयाकर, परमसुखदायक, हे दारिद्र्य‌विनाशक, निर्वैरविधायक, सुनीतिवर्धक, हे प्रीतिसाधक, राज्यविधायक, शत्रुविनाशक, हे सर्व‌बलदायक, निर्बलपालक, हे सुधर्मसुप्रापक, हे अर्थसुसाधक, सुकामवर्द्ध‌क, ज्ञानप्रद, हे सन्ततिपालक, धर्मसुशिक्षक, रोगविनाशक, हे पुरुषार्थप्रापक, दुर्गुणनाशक, सिद्धिप्रद, हे सज्जनसुखद, दुष्टसुताड़न, गर्वकुक्रोधकुलोभविदारक, हे परमेश, परेश, परमात्मन्, परब्रह्मन्, हे जगदानन्दक, परमेश्वर, व्यापक सूक्ष्माच्छेद्य, अजरामृताभयनिर्बन्धानादे, हे अप्रतिमप्रभाव, निर्गुणातुल, विश्वाद्य्, विश्वव‌न्द्य, विद्वद्विलासक, इत्याद्यन‌न्तविशेषणवाच्य, हे मङगलप्रदेश्वर! आप सर्वथा सबके निश्चित मित्र हो, हमको सत्यसुखदायक सर्वदा हो, हे सर्वोत्कृष्ट, स्वीकरणीय, वरेश्वर! आप वरुण अर्थात सबसे परमोत्तम हो, सो आप हमको परमसुखदायक हो, हे पक्षपातरहित, धर्म्मन्यायकारिन्! आप अर्य्यमा (यमराज‌) हो इससे हमारे लिए न्याययुक्त सुख देने वाले आप ही हो, हे परमैश्व‌र्य्यवन्, इन्द्रेश्वर! आप हमको परमैश्वर्ययुक्त शीघ्र स्थिर सुख दीजिए | हे महाविद्यावचोधिपते, बृहस्पते, परमात्मन्, हम लोगों को (वृहत्) सबसे बड़े सुख को देने वाले आप ही हो, हे सर्वव्यापक, अनन्त पराक्रमेश्वर, विष्णो! आप हमको अनन्त सुख देओ जो कुछ मांगेंगे सो आप से ही हम लोग मांगेंगे | सब सुखों का देने वाला आपके बिना कोई नहीं है सर्वथा हम लोगों को आपका ही आश्रय है | अन्य किसी का नहीं क्योंकि सर्वशक्तिमान् न्यायकारी दयामय सबसे बड़े पिता को छोड़ के नीच का आश्रय हम लोग कभी नकरेंगे आपका तो स्वभाव ही है कि अङगीकृत को कभी नहीं छोड़ते सो आप सदैव हमको सुख देंगे यह हम लोगों को दृढ़ निश्चय है ||1||