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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (7)

इसलिए उपनिषदों ने ब्रह्म के केवल उन्हीं गुणों को जान लेने की शिक्षा दी है, जो मनुष्य को उन्नति पथ पर पहुंचा देने के लिए पर्याप्त हैं |
सबसे पहिली शिक्षा ब्रह्म के विषय में यह है कि तुम उसे व्यक्ति रूप में न मानकर समष्टि रूप में मानो, अर्थात वह विभु है, परिच्छिन्न नहीं है, सर्वदेशी है,एकदेशी नहीं |इस बात का मानना उपनिषद् ने इतना अधिक आवश्यक समझा है कि इसको अनेक अनेक रीति से वर्णन किया है | हम उसका यहाँ थोड़ा सा विवरण देते हैं :-

(अब गतांक से आगे)

उपनिषद् ने बतलाया है कि तुम उसे 'अनेजत्' एकरस समझो | विचार करके देख लो कि एकरस सदैव सर्वदेशी ब्रह्म ही हो सकता है | फिर उपनिषद् ने इसी भाव को प्रदर्शित करने के लिये ब्रह्म के निम्न गुणों का वर्णन किया है :

1. वह मन से भी अधिक वेग वाला है, क्योंकि वह प्रत्येक जगह पूर्वमर्षत् पहले से ही पहुँचा हुआ रहता है | इसीलिये सर्वदेशी है |

2. इन्द्रियों से प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि इन्द्रिया एकदेशी वस्तु का ही ज्ञान प्राप्त कर सकती हैं |

3. सर्वदेशी होने से ठहरा हुआ ही, अन्य दौड़ते हुओं का उल्लघंन किये हुए है |

4. उसी ब्रह्म के अन्तर्गत वायु जलों को बादल के रूप में धारण किये हुए रहता है | जगत् का कोई भाग ऐसा नहीं है कि जहाँ वायु न हो | जहाँ कहीं स्पष्ट रुप से वायु नही होता, वहां आकाश (Ether) होता है | इस प्रकार से जगद्व्यापी वायु उसी ब्रह्म के अन्तर्गत अपना कार्य करता है |

5. वह गति देता है परन्तु स्वयं गति में नहीं आता |ब्रह्म का सृष्टि कर्त्तव्य केवल इतने ही से प्रारम्भ होकर पूर्णता प्राप्त कर लेता है कि वह उस समय जब प्रलय के बाद जगत् उत्पन्न होता है और प्रकृति विकृत होना चाहती है, इस उद्देष्य की प्राप्ति के लिये शान्त और स्तब्ध प्रकृति में एक गति का संचार करता है, जिससे प्रकृति की शान्ति और स्तब्धता भंग होकर क्रमशः सूक्ष्म और स्थूल भुतों की उत्पत्ति होकर प्रलय सृष्टी रुप में परिवर्तित हो जाती है | इसी गति को विज्ञान में गति शक्ति (Energy) नाम दिया गया है | पंचभूत, प्रकृति और ब्रह्म प्रदत गति के संघात का नाम है, "Matter combined with Energy " | यहां एक शंका उत्पन्न हुआ करती है कि गति के लिए गतिदाता से पृथक कुछ आकाश (Space) होना चाहिए, तभी तो वह गति दे सकता है | परन्तु बात ऐसी नहीं है | ब्रह्म को उस गति के देने के लिए किसी प्रकार की कोई हरकत करने की कोई जरूरत नहीं होती, और न उसमें हरकत होती है, क्योंकि वह एकदेशी नहीं, सर्वदेशी है | यह गति जो प्रकृति में एक आलमगीर हरकत पैदा कर देती है, ब्रह्म के केवल ईक्षण (प्राप्त वस्तु को कार्य में लगाने की इच्छा) मात्र से , बिना किसी हरकत के, उत्पन्न हो जाती है | पश्चिमी वैज्ञानिक भी इच्छा से गति होने के सिद्धान्त का "Will procedes motion" कहकर समर्थन करते हैं | अतः स्पष्ट है कि ब्रह्म इस प्रकार की गति का दाता होने पर भी स्वयं गति में नहीं आता | युनान के प्रसिद्ध दार्शनिक 'अरस्तु' ने भी उपनिषद् के इस सिद्धान्त की पुष्टि की है | अरस्तु ने आमतौर से ईश्वर को Unmoved mover कहा है |
{God is merely the source of movement,the first mover (आदिकारण) Who himself is never moved. (The AGE of Aristotle p. 46)}

6. वही दूर है वही समीप है, वही सबके भीतर और वही सबके बाहर है अर्थात सब जगह है |

7. जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों चराचर जगत् को उस ब्रह्म के अन्दर और ब्रह्म को उन सम्पूर्ण भूतों के अन्दर देखता है वह घृणारहित हो जाता है | इसी का नाम विश्व प्रेम है जो उपनिष्द् की पहली ही शिक्षा के अन्तर्गत है और जिसे ब्रह्म विद्या का पहला ही पाठ कहना चाहिए | जब ब्रह्म प्रत्येक‌ प्राणी के अन्तर्गत है, तब प्रत्येक प्राणी के शरीर ईश्वर के मंदिर ही हुए और इसीलिये सबको प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना पड़ता है और इसीलिये वह सबके प्रति घृणारहित हो जाता है |

8. यह ब्रह्म सर्वत्र पहुँचा हुआ है और शरीर रहित फोड़े-फुंसी के विकारों से पाक(रहित) और नाड़ी-नस के बन्धन से पृथक और सर्वव्यापक है |

इस प्रकार हमने देख लिया कि नौ प्रकार से वर्णन करके उपनिषद् ने इस शिक्षा को अधिक से अधिक स्पष्ट किया है :-

1. ब्रह्म सर्वदेशी है | यह ब्रह्म का पहला गुण है जो ब्रह्म विद्या के विद्यार्थी के हृदय में सबसे पहले अंकित हो जाना चाहिए | बिना इसको समझे, बिना इस पर श्रद्धा और विश्वास किये, हम ब्रह्म विद्या के स्वच्छ‌ और उन्नत पथ की और कदम भी नहीं बढ़ा सकते |

2. ब्रह्म का दूसरा गुण एकत्व है, अर्थात ब्रह्म एक ही है | दूसरा, तीसरा, चौथा आदि नहीं, इसका उपासक को द्दृड़ विश्वास हो जाना चाहिए |

3. ब्रह्म का तीसरा गुण 'शुक्रम्' अर्थात जगत् का आदिमूल कारण होना है |

4. चौथा 'शुद्धम्' गुण है, अर्थात ब्रह्म की शुद्धता को लक्ष्य में रखते हुए ब्रह्म की समीपता प्राप्त करने के लिये उपासक को जल से शरीर, सत्य से मन, विद्या और तप से आत्मा और निर्मल ज्ञान से बुद्धि को शुद्ध करना चाहिए, तभी वह ब्रह्म विद्या का विद्यार्थी बन सकता है |

5. पाँचवां गुण 'अपापविद्वम्' है | मनुष्य को भी निश्पाप बनने के लिए पाप के मूल विपरीत मिथ्या ज्ञान का बहिष्कार करना चाहिए |

'6. कवि' छठा गुण ब्रह्म का है | कवि, क्रान्तदर्शी, सर्वद्रष्टा तथा स्रर्वज्ञ को कहते हैं |

7. 'मनीषी' ब्रह्म का सातवाँ गुण है, जो ब्रह्म के पूर्ण ज्ञानी होने की घोषणा करता है |

8. 'स्वयम्भू' गुण प्रकट करता है कि ब्रह्म अपनी सत्ता से आप स्थिर (कायम-बिल्जात) है, किसी का मोहताज नहीं |

9. 'फलदाता' गुण अर्थात ब्रह्म अपनी अनादि प्रजा जीव के कर्मों के फलों का 'याथातथ्यता' ठीक ठीक विधान किया करता है | कर्म का फल न्यून या अधिक नहीं हो सकता |

बस उपनिषदों ने मनुष्यों के लिये इन्हीं नौ गुणो का जान लेना और उनको अपने अन्तःकरण में धारण कर लेना, अन्तिम उद्देष्य की प्राप्ति तक के लिये पर्याप्त बतलाया है |

क्रमशः