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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

हमें बता, हमारा धन क्या है ?

ओउम् | किं नो अस्य द्रविणं कद्ध रत्नं वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान् |
गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म ||
ऋ. 4|5|12
शब्दार्थ -

(हे)जातवेद:...................हे सर्वज्ञ ! तू
चिकित्वाऩ्......................जानता है, अतः
नः...............................हमें
वि + वोचः.....................विशेष रूप से बता कि
अस्य............................इसमें से
नः...............................हमारा
द्रविणम्.........................धन
किम्.............................क्या है, और
कत्..............................कौन सी
ह.................................सच्ची
रत्नम्............................मूल्यवती सम्पत्ति है और
यत्..............................जो
नः...............................हमारे
अस्य............................इस
अध्वनः.........................मार्ग का
परम‌म्..........................परम, अत्यन्त
गुहा..............................गुप्त रहस्य है ताकि हम
रेकु...............................शंकायुक्त
पदम्............................पद
निदाना:........................ध्ररते हुए,
न...............................न
अगन्म.........................जाए‍ँ |

व्याख्या -

भक्त देखता है कि धन समझकर जिन-जिन पदार्थों का संग्रह किया था, वे एक-एक करके चले जाते हैं | उसे सन्देह हो जाता है कि यह धन है भी ? वह व्याकुल होकर कहता है -

वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान् = हे जातवेद ! सर्वज्ञ ! तू ज्ञान रखता है, अतः तू हमें स्पष्ट बता कि -

किं नो अस्य द्रविणं = इसमें से हमारा धन है क्या ? जिससे प्रीति हो, तृप्ति हो, जिससे यह जीवनयात्रा अनायास निवाही जा सके, उसे धन कहते हैं | जो नित्य नहीं, आगामापायी है, आनेजाने वाला है, उससे नित्य की, ध्रुव की तृप्ति कैसे होगी ? वेद में आता है -

रत्नं दधाति दाशुषे = दाता के लिए रत्न बनाता है, अथवा दाता को रत्न देता है | वह -

कद्ध रत्नम् = रत्न कौन सा है ? और साथ ही साफ साफ बताना -

गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य = हमारे इस मार्ग का - जीवन पथ का - परम रहस्य क्या है, अर्थात हम जो यह लम्बी संसार यात्रा कर रहे हैं, हमें इसका कोई लक्ष्य, कोई उद्देश्य दृष्टिगोचर नहीं होता | क्या यह ऐसे व्यर्थ ही है ? हमारी जीवनयात्रा निरुद्दिष्ट है ? अथवा इसका कोई उद्देश्य = प्रयोजन = साध्य है ? है, तो फिर वह गुप्त है | हमारी आँखों से,हमारी बुद्धि से ओझल है | इसे भी तो तू ही बताएगा, क्योंकि तू चिकित्वान् = जानकार जो ठहरा | तू न बताएगा तो कहीं हम -

रेकु पदं न निदाना अगन्म = संदिग्ध पद धरते न चल पड़ें | सन्देहास्पद दशा में हमें डर लगता है | तेरे भक्त ने कहा है -

संशयात्मा विनश्यति = संश्यालु नष्ट हो जाता है | संशयग्रस्त रहने से कर्त्तव्य कर्म्म‌ कर ही नहीं पाता | कर्त्तव्य कर्म्म न करने से भविष्य के नाश में सन्देह ही नहीं रहता | नाश से बचने के लिए निसन्देह होना आवष्यक है, अतः परमोपदेशक ! इस सब समस्याओं का समाधान तू ही कर, हमें कुछ नहीं सूझ रहा |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)