"योग , साधना का विषय, तमाशे का नहीं"

महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती जी की पुस्तक "योगाभ्यास और महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती" के पृ.130 से उद्दृत‌|

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि महर्षि के लिए योग अनवरत साधना का विषय रहा, प्रदर्शन का नहीं | यह उनके 14 जुलाई1880 ई. को कर्नल हेनरी आल्काट को लिखे पत्र से स्पष्ट है | इस पत्र का कुछ भाग नीचे दिया जाता है

" और जो मैने सिनेट साहब से कहा था, वह ठीक है, क्योंकि मैं इन तमाशे की बातों को देखना दिखलाना उचित नहीं समझता चाहे वे हाथ की चालाकी से हों , चाहे योग की रीति से हों | क्योंकि योग के किए कराए बिना किसी को भी योग का महत्व वा इससे सत्य प्रेम कभी नहीं हो सकता, वरन लोग सन्देह और आश्चर्य में पड़कर उसी तमाशे दिखलाने वाले की परीक्षा और सब सुधार की बातों को छोड़कर तमाशे देखने को सब दिन चाहने लगते हैं | और उसके साधन करना स्वीकार नहीं करते | जैसे सिनेट साहब को मैने न दिखलाया और न दिखलाना चाहता हूं, चाहे वे राजी रहें, चाहे नाराज हों, क्योंकि जो मैं इसमें प्रवृत होऊं, तो सब मूर्ख और पण्डित मुझसे यही कहेंगे कि हमको भी कुछ योग के आश्चर्यजनक काम दिखलाइए, जैसा कि आपने उसको दिखलाया | ऐसी संसार की तमाशे की लीला मेरे साथ भी लग जाती जैसी मैडम एच.पी. ब्लेवस्तिकी के पीछे लगी है |"

हमारी दृष्टि में महर्षि दयानन्द प्रथम श्रेणी के सिद्ध् योगी थे | अनेकों यौगिक सिद्धियां व विभूतियां उनको प्राप्त‌ थीं, किन्तु उनका प्रदर्शन उन्होंने कभी नहीं किया | लेकिन जिस देश में चमत्कार को ही नमस्कार करने की आदत पड़ी हो, वहां लोग कब मानने वाले थे | बहुत कुरेदने पर एक बार अजमेर में उन्होंने बस इतना ही कहा था .." क्या आप समझते हैं कि हम इतना बड़ा सुधार का कार्य योग सिद्धि के बिना ही कर रहे हैं ?" कार्यक्षेत्र में आने के पश्चात महाराज एक प्रहर रात्री के रहते हुए ही योगाभ्यास करने बैठ जाते थे, जिससे उनके दिन के कार्यों में कोई व्यवधान न पड़े, किन्तु संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) का त्याग उन्होनें कभी नहीं किया | लेखन और वेद भाष्य के पीछे संयम ही उनकी श‌क्ति थी |

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