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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (8)

बस उपनिषदों ने मनुष्यों के लिये इन्हीं नौ गुणो का जान लेना और उनको अपने अन्तःकरण में धारण कर लेना, अन्तिम उद्देष्य की प्राप्ति तक के लिये पर्याप्त बतलाया है |

(अब गतांक से आगे)

ब्रह्म को हम किस प्रकार अपने हृदय में धारण करें अथवा यों कहिये कि हम किस प्रकार अपने आत्मा को उन्नत करें, इसके लिए उपासक को इन गुणों का मानसिक जप करना होगा | केवल मुंह से किसी शब्द का रटना जप नहीं है, किन्तु हृदय से उसके अर्थ का चिन्तन, जप का उत्तरार्द्ध और जप का मुख्य और आवश्यक अंग है | आत्मा की उन्नति या ब्रह्मा की प्राप्ति के उद्योग का आरम्भ इसी जप से होता है | इस जप से उपासक का आत्मा ईश्वरीय गुणों से भासित होता है और उसमें गुण वृद्धि हुआ करती है | इसी को उपासना का पहला अंग भी कहते हैं | उपासना का दूसरा और अन्तिम अंग ब्रह्म को हृदय में धारण कर लेना है | पहले अंग में जहां वाचक (शब्द‌) को समझते हुए हृदय में रखा जाता है, दूसरे अंग में हृदय को वाच्य (अर्थ‌) का मन्दिर बनाना पड़ता है, अर्थात वाच्य को हृदय (आत्मा) में रखा जाता है | ब्रह्म विद्या के पहले अंग की प्राप्ति के उद्योग का सूत्रपात सन्ध्या से किया जाता है, और दूसरे अंग की पूर्ति अष्टांग योग के अन्तिम अंगो से होती है | सन्ध्या को भी सन्ध्या योग इसीलिये कहते हैं | सन्ध्या के उपासकों को निम्न योग्यता प्राप्त कर लेनी चाहिए :-

1. शारीरिक उन्नति अर्थात् समस्त इन्द्रिय बलवान्, पवित्र और यशवाली होनी चाहिए |
2. मानसिक उन्नति अर्थात् हृदय द्वेष से रहित होना चाहिये और प्राणायामादि के द्वारा उसमें प्रत्याहार की प्राप्ति की योग्यता उत्पन्न हो जानी चाहिये |
3. आत्मिक उन्नति: इसके लिए उपासना के प्रथम अंग वाचक (शब्द‌) को हृदय में धारण करने का अभ्यास करना चाहिये |

इतना कार्य सन्ध्या से हुआ करता है और इसी के लिये सन्ध्या की जाती है और करनी चाहिये | वाचक (शब्द‌) के हृदय में धारण करने का फल यह होता है कि मनुष्य का हृदय ईश्वरीय गुणों के आलोक से आलोकित हो उठता है, और विश्व प्रेम का आभास होने लगता है | जप अत्यन्त आवश्यक वस्तु है | इससे स्मृति का भी विकास होता है | योग के इस सिद्धान्त को पश्चिम के विद्वान भी स्वीकार करते हैं | इंग्लैंड के प्रसिद्ध राजनेता ग्लेडस्टोन के लिये कहा जाता हे कि उसने सम्पूर्ण होमर कृत इलियट को रट रखा था | जहां से कोई चाहे वह सुना सकता था | इसी से उसकी स्मृति बहुत उच्चकोटि की थी | परन्तु जप का अर्थ केवल Cat (बिल्ली) और Dog (कुत्ता) के अर्थ का रटना नहीं है | वह जप जिसका ऊपर विधान किया गया है, चित्त के उन्नत करने का साधन और मुख्य साधन है |

ब्रह्म को किस प्रकार उपासक (योगी) हृदय में धारण कर सकता है ? यह बात है जो ब्रह्म विद्या का अन्तिम पाठ है ओर यह पाठ उपनिषद् ने इस प्रकार दिया है कि :-
" जिस अवस्था में समस्त चराचर जगत् को योगी परमेश्वर हुआ ही जानने लगता है, तब ऐसे एकत्व को देखने वाला (योगी) मोह और शोक से छूट जाता है |"

क्रम‌शः