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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (9)

......ब्रह्म को किस प्रकार उपासक (योगी) हृदय में धारण कर सकता है ? यह बात है जो ब्रह्म विद्या का अन्तिम पाठ है ओर यह पाठ उपनिषद् ने इस प्रकार दिया है कि :-
" जिस अवस्था में समस्त चराचर जगत् को योगी परमेश्वर हुआ ही जानने लगता है, तब ऐसे एकत्व को देखने वाला (योगी) मोह और शोक से छूट जाता है |"

(अब गतांक से आगे)

उपनिषद् वाक्य एक‌ अवस्था-विशेष का संकेत करता है | वह अवस्था कौन सी है ? यही प्रश्न‌ है, जिस पर विचार करना है | योग के अङ्गों में प्राणायाम के पश्चात पाँचवें अंग से शरीर के भीतर इष्ट परिवर्तनों के करने का विधान है, मनुष्य की शक्ति अन्तः और बाह्य कारणों में साधारणतया फैली हुई रहती है और इसी लिये योगी के सिवाय कोई मनुष्य अपनी पूर्ण शक्ति को किसी काम में नहीं लगा सकता | जब योगी अपनी समस्त शक्तियों को भीतर एकत्रित करना चाहता है तब यह उद्देश्य प्रत्याहार के अभ्यासों द्वारा पूरा किया जाता है | प्रत्याहार समस्त शक्ति को केन्द्रित‌ करने की कार्यप्रणाली का ही नाम है | उस समस्त (प्रत्याहार द्वारा) एकत्रित शक्ति को किसी एक लक्ष्य पर लगा देने का नाम धारणा है और उसी एकत्रित शक्ति को किसी एक स्थान पर न लगाकर आत्मा में लगा देने का नाम ध्यान है, और इसी की उच्चावस्था को समाधि कहते हैं | इस प्रकार समस्त शक्ति को आत्मा में लगा देने को ध्यान कहा गया है, परन्तु योगी आत्मा में शक्तियों को लगाने का कोई साक्षात् यत्न नहीं कर सकता | हाँ , इस कार्य की पूर्ति असाक्षात यत्नों से हुआ करती है अर्थात् कोई भी अपनी शक्तियों को साक्षात् यत्नों से आत्मा के अन्दर लगा नहीं सकता, परन्तु विशेष अवस्था के उत्पन्न कर लेने से वह शक्ति स्वयमेव आत्मा में लग जाया करती है | उसी असाक्षात यत्न का नाम ध्यान है | ध्यान के समझने में आमतौर से गलती की जाया करती है | निराकार ईश्वर के ध्यान की बात आते ही लोग कहने लगते हैं कि जिसकी कोई शक्ल नहीं, कोई सूरत नहीं, भला किस प्रकार कोई उसका ध्यान कर सकता है ? ऐसे पुरुषों के मतानुसार ध्यान किसी बाह्य रूप-रंग वाली वस्तु को भीतर हृदय में लाने का नाम है, परन्तु बात सर्वथा इसके विपरीत है | ध्यान बाहर से किसी वस्तु को भीतर लाने को नहीं कहते किन्तु भीतर (हृदय में) जो कुछ‌ भी हो उस सबको निकाल कर बाहर फेंक देने का नाम ध्यान है | इसी लिये सांख्य के आचार्य कपिल ने कहा है -

"ध्यानं निर्विषयं मनः |"

अर्थात सांख्य की परिभाषानुसार ध्यान मन को निर्विषय करने को कहते हैं | मन को निर्विषय करने का अर्थ यह है कि मन का इन्द्रियों से काम लेना, जिससे जाग्रतावस्था बनी रहती है, छूट जाय, तथा मन का अपने भीतर काम करना भी - जिससे स्वप्नावस्था निर्मित होती है - बन्द हो जाये |
इसका तात्पर्य यह है कि जाग्रतावस्था ही में योगी अपनी वह अवस्था बना ले जो सुषुप्ति में हुआ करती है और जिसमें मन पूर्ण रीति से निष्क्रिय (निर्विषय) हुआ करता है | आत्मा की दो प्रकार की शक्तियाँ हैं, एक वह जो सूक्ष्म और स्थूल शरीर द्वारा, जगत् में काम करती हैं और जिसे आत्मा की बहिर्मुखी वृति कहते हैं | दूसरी वह जो आत्मा के अन्दर काम करती है और जिसका नाम अन्तर्मुखी वृति है | दोनो वृतियों में से एक वृति प्रत्येक समय काम किया करती है | न दोनो वृतियाँ एक साथ काम करती हैं और न दोनों एक साथ बन्द हो जाती हैं | यदि एक वृति बन्द हो जाय, तो दूसरी स्वयमेव काम करने लगती है |

बहिर्मुखी वृति के बन्द करने का नाम ही मन का निर्विषय करना है, मन के निर्विषय करने के साधन ध्यान‌ के अभ्यास हैं | इस प्रकार मन के निर्विषय हो जाने मात्र से आत्मा की अन्तर्मुखी वृति स्वयमेव जारी हो जाती है | जिस प्रकार नहर का फाटक बन्द कर देने से समस्त जल स्वयमेव नदी की धारा में प्रवाहित होने लगता है और इस अन्तिम कार्य के लिये किसी प्रकार का यत्न अपेक्षित नहीं होता, इसी प्रकार नहर रूपी बाह्य वृति बन्द होने से आत्म-रूपी नदी में अन्तर्मुखी वृति रूप जल स्वयमेव प्रवाहित हो जाता है |

यही वह अवस्था है जिसका उपर्युक्त मन्त्र में उल्लेख है | इस अवस्था को प्राप्त कर लेने ही से योगी एकत्वदर्शी हो जाता है |

क्रम‌शः