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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मन स्थिर कर

ओउम् ! स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित् |
अश्मानं चिच्छवसा दिद्यतो वि विदो गवामूर्वमुस्रियाणाम् ||
ऋ. 5|30|4||

शब्दार्थ
हे इन्द्र.................हे योगेश्वर्य्येच्छुक ! यदि तू
जातः...................समर्थ होकर
मनः....................मन को
स्थिरम्..................स्थिर
चकृषे....................करे, तो तू
एक + इत्.............अकेला ही
भूयसः + चित्..........बहुतों को भी
युधये...................युद्ध के लिए
वेषि.....................प्राप्त हो सकता है, जीत सकता है, पर्य्याप्त है |
अश्मानम्...............पत्थर को
चित्.....................भी
शवसा....................बल से
दिद्युत:...................चमका दे और
उस्रियाणाम्..............सुख वर्षानेवाली
गाम्.....................किरणों, इन्द्रियों के
ऊर्वम्.....................विघातक को
वि + विदः...............विचार

व्याख्या

मन बहुत चञ्चल है, इसको वश में करना बहुत कठिन है | गीता (6/34) में कहा है -

चञ्चलं हि मनः कृष्ण ! प्रमाथि बलवद्दृढ़म् | तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ||

हे कृष्ण ! मन बहुत चञ्चल है, उधेड़बुन करनेवाला, बलवान तथा हठी है | वायु को वश में करने के समान उसका निग्रह अत्यन्त दुष्कर है, कठिन है | चञ्चलता का दृश्य वेद ने दिखाया है -‍

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति (यजु. 34|1)

जागते हुए का मन बहुत दूर चला जाता है, वैसे ही सोये हुए का चला जाता है अर्थात न सोते चैन , न जागते , ऐसा वह मन चञ्चल और विकल है | काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि नाना शत्रु आत्मा पर प्रहार कर रहे हैं | आत्मा अकेला, और उसके शत्रुओं की विशाल सेना ! कैसे पार पाएगा आत्मा ? वेद कहता है -

स्थिरं मन: चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित् = हे इन्द्र ! यदि तू मन को स्थिर कर सके तो तू अकेला ही बहुतों से भी लड़ने को पर्याप्त है | मन के द्वारा युद्ध तो तभी हो सकता है, जब मन किसी एक स्थान पर ठहरे, अतः मन को स्थिर करो |संसार के सभी व्यवहारों के लिए मन की स्थिरता अपेक्षित होती है | मन की शक्ति के सम्बन्ध में वेद में कहा है -

यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते (यजु. 34|3) = जिसके बिना कोई भी कार्य्य‌ नहीं किया जाता | आँख देखती है किन्तु मन के सहयोग से; कान सुनता है मन के सहयोग से | जिस इन्द्रिय के साथ मन का सहयोग न हो, वह कार्य्य नही हो सकता, अतः ऐसे महाबली मन को ठहराना चाहिए | मन वश में हो जाए तो अज्ञान का पत्थर भी फूट जाता है -

अश्मानं चिच्छवसा दिद्यतः = पत्थ‌र को भी बल से चमका देता है | पत्थ‌र चमक उठा तो पत्थर ही न रहा | स्थिर मन वाला ज्ञान प्रतिबन्धकों को भी जान लेता है | धारणा, ध्यान, समाधि के द्वारा मन ठहराया जा सकता है | धारणा, ध्यान, समाधि -‍ इस त्रिक को संयम कहते हैं | इसका फल (योगदर्शन 3|5) में यह बताया है -

तज्जयात्प्रज्ञालोक: = संयम के जीतने से बुद्धि प्रकाश होता है | प्रकाश होने पर सभी रुकावटों का प्रत्यक्ष भान होने लगता है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से)