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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (10)

....जिस प्रकार नहर का फाटक बन्द कर देने से समस्त जल स्वयमेव नदी की धारा में प्रवाहित होने लगता है और इस अन्तिम कार्य के लिये किसी प्रकार का यत्न अपेक्षित नहीं होता, इसी प्रकार नहर रूपी बाह्य वृति बन्द होने से आत्म-रूपी नदी में अन्तर्मुखी वृति रूप जल स्वयमेव प्रवाहित हो जाता है |
यही वह अवस्था है जिसका उपर्युक्त मन्त्र में उल्लेख है | इस अवस्था को प्राप्त कर लेने ही से योगी एकत्वदर्शी हो जाता है |

(अब गतांक से आगे)

ध्यान की अवस्था में ध्यानावस्थित योगी समझता है कि वह ध्याता है और किसी ध्येय की प्राप्ति के लिये ध्यानरूपी क्रियायें करता है | परन्तु जब ऊँची समाधि अवस्था में पहुँचता है, तब ध्याता और ध्यान दोनों का ज्ञान तिरोहित हो जाता है और केवल ध्येय (ईश्वर) ही उसके समस्त ज्ञान का लक्ष्य रह जाता है और उस समय योगी की वही अवस्था होती है जिसके लिए मुंडकोपनिषद् में कहा गया है :-

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण |
अधश्चोर्ध्वञ्च प्रसृतं ब्रह्मै वेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ||म. 2|2|11

अर्थात (इदम् अमृतम्) यह अमृत रूप (ब्रह्म एव) ब्रह्म ही है (पुरस्ताद् ब्रह्म)आगे ब्रह्म है (पश्चात् ब्रह्म) पीछे ब्रह्म है (दक्षिणतः) दाहिने (च) और (उत्तरेण) बाएं (अधः) नीचे (च) और (उर्ध्व) ऊपर भी (प्रसृतम्) फैला हुआ है, (इदम् विश्वम्) यह सब विश्व (इदम् वरिष्ठम्) यह अत्यन्त श्रेष्ठ (ब्रह्म एव) ब्रह्म ही है | भाव इसका यह है कि उस ज्ञानी को सब और ब्रह्म ही दिखाई देता है | इसी अवस्था के लिये एक कवि ने कहा है :-

"जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है |"

उपनिषद् के इसी भाव को कुछेक अन्य कवियों ने सुन्दरता से अपनी कविताओं में समाविष्ट किया है -

दिया अपनी खुदी को जो हमने मिटा |
वह जो परदा बीच में था, न रहा ||
रहा परदे में अब न वो परदा-नशीं
कोई दूसरा उसके सिवा न रहा||1||

जलवे से तिरे भर गई, इस तरह से आँखें |
हो कोई भी, आता है फकत‌ तू ही नजर में ||2||

आप ही आप हैं यां, गैर का कुछ काम नहीं |
जातेमुत्लक में तिरे शक्ल नहीं, नाम नहीं ||3||

याद में उनकी, ऐसे महव हुए |
अपनी सुध बुध रही न कुछ बाकी ||4||
बेखुदी छा जाये ऐसी दिल से मिट जाये खुदी |
उनके मिलने का तरीका, अपने खो जाने में है ||5||

जब मैं थी तब हर नहीं जब हर तब मैं नाय |
प्रेम-गली अति साँकरी ता में दो न समाय ||6||

एक जान होके चलते हैं, मैं तू को छोड़कर|
उलफत की तंग राह में दो की गुजर नहीं ||7||

[1. खुदी= अहङ्कार |, 2. जातेमुत्लक= ईश्वर की असीम सत्ता |, 3. महव= लवलीन |, 4. बेखुदी= निरहंकारिता |, 5. मैं= मेरे तेरे पन का भाव, ममता |]

समस्त चराचर जगत् में योगी ब्रह्म के सिवा कुछ नहीं देखता | जब उसने अपने प्रेमपात्र के प्रेम के आधिक्य में में अपनी ही सुध‍-बुद्ध बिसार दी है, तब प्रकृति के ईंट-पत्थरों की उसे किस प्रकार चिन्ता रह सकती है और वह कैसे मोह, शोक के बन्धन में रह सकता है ? यही ब्रह्म विद्या का अन्तिम पाठ है कि जिससे जीव अपनी सत्ता कायम रखते हुए भी उससे बेसुध रहता है, और ध्येय (ब्रह्म) के सिवा कुछ भी उसकी स्मृति, ध्यान या अनुभव का विषय नहीं रह जाता | इसी अवस्था के प्राप्त कर लेने पर योगी का नाम जीवन्मुक्त हो जाता है और इसी अवस्था वाले योगी शरीर के छूटने पर आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं | इसी अवस्था पर पहुँचे हुए योगी के लिए उपनिषद् में कहा गया है -

"स यो ह वै तत्परम् ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति |" (मुण्डकोपनिषद् 3|2|9)

अर्थात वह जो इस ब्रह्म को जान लेता है , ब्रह्म ही हो जाता है | कई विद्वान इसका अर्थ करते हुए कह दिया करते हैं कि ब्रह्मवित् ब्रह्म के सदृश हो जाता है | परन्तु इस प्रकार के अर्थ करने की जरूरत नहीं | इस वाक्य में प्रयुक्त 'भवति' क्रिया से स्पष्ट है कि ब्रह्मवित् पहले ब्रह्म नहीं था, अब हुआ है तो वह आदि ब्रह्म हुआ, परन्तु जिस ब्रह्म के जानने से ब्रह्मवित् हुआ वह अनादि ब्रह्म है | यह अन्तर सदैव ब्रह्म और ब्रह्मवित् में बना रहता है |

क्रमशः