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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

असार, निर्बल प्रार्थना

ओउम् ! अनिरेण वचसा फल्ग्वेन प्रतीत्येन कृधुनातृपासः |
अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम् ||
ऋ. 4|5|14||

शब्दार्थ
अनिरेण...............निर्बल
फल्ग्वेन...............फल्गु, असार
प्रतीत्येन..............दिखावे के, अनिश्चित
कृधुना.................तुच्छ, लघु
वचसा.................प्रार्थना-वाक्य से
अतृपासः...............स्वयं तृप्त न होने वाले
ते......................वे, हे
अग्ने..................प्रभो
इह.....................इस जन्म में
अध....................अब
किम्...................क्या
वदन्ति.................कहते हैं |
अनायुधासः............आयुधरहित
आसता.................अभद्र से
आ + सचन्ताम्.......युक्त होंगे |

व्याख्या

संसार में जब किसी को किसी कार्य के लिए प्रेरणा की जाती है, यदि वह प्रेरणा सफल न हो, तो कहा जाता है कि प्रेरणा निर्बल थी, इसमें सत नहीं था | दूसरे से अपनी बात मनवाने के लिए मनुष्य अपनी वाणी में बल लाने का प्रयत्न करता है | उसकी चेष्ठा होती है कि उसके वचनों में ओज हो ताकि सुनने वाला उससे प्रभावित हो जाए और उसके वचन प्रवाह में बह चले | इसीलिए विशेष विशेष अवसरों पर जब कि जनता को विशेष रूप से उत्तेजित करना अभिप्रेत होता है , विशेषरूप से प्रभावशाली वक्ता आमन्त्रित किए जाते हैं | इसी भांति अपेक्षित गुण प्राप्ति के लिए, अपनी त्रुटि के परिहार के लिए आर्त्त और आर्द्रभाव से भगवान से जो प्रेरणा की जाती है, उसे प्रार्थना कहते हैं | यदि प्रार्थना में कोई बल न हुआ, हृदय के अन्तःस्थल से यदि उसका स्फुरण नहीं हुआ, तो वह निर्बल रहेगी | निर्बल प्रेरणा जबकि हमारे जैसे सामान्य पुरुष को नहीं हिलाती, तो उस अत्यन्त अडोल परमात्मा को कैसे हिलाएगी ? अतः प्रार्थना ओजस्विनी होनी चाहिए | वह फल्गु न हो, सारहीन, मरियल न हो, अपितु सारयुक्त जीवटवाली हो | वह बाहरी दिखावे की न हो, वह तो अनिश्चित होगी | उस प्रार्थना से स्वयं प्रार्थी का स्वान्त शान्त नहीं हो रहा, उसका मन उससे नहीं भरता, अतृप्त रहता है | कहने वाले को ही जब अपने वचनों पर आस्था नहीं तो सुनने वाले को क्या विश्वास होगा ? ऐसे लोगों की प्रार्थना विफल जाती है |

ये लोग मानो ऐसे हैं कि लड़ने चले हैं और हाथ में कोई हथियार, शस्त्र, अस्त्र, लाठी आदि कुछ नहीं ले चले | ऐसे योद्धाओं का जो परिणाम होना चाहिए, वही होता है अर्थात
अनायुधास आसता सचन्ताम् = हथियारों से खाली अभद्र से सम्बद्ध हों | जिस प्रकार संसार में उपकरणरहित का निर्वाह कठिन है, वैसे ही परमार्थ-योद्धा का निर्वाह भी कठिन है | परमार्थ के युद्ध में, पर‌मात्मा को वश में करने के लिए प्रार्थना आयुध है | इसलिए मिमांसादि शास्त्र प्रभु के स्तुति प्रार्थना परक मन्त्रों को शस्त्र कहते हैं | यह शस्त्र तीक्ष्ण होना चाहिए | कुण्ठित शस्त्र से युद्ध नहीं लड़ा जा सकता |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
('स्वाध्याय सन्दोह' से साभार‌)