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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (11)

....अर्थात वह जो इस ब्रह्म को जान लेता है , ब्रह्म ही हो जाता है | कई विद्वान इसका अर्थ करते हुए कह दिया करते हैं कि ब्रह्मवित् ब्रह्म के सदृश हो जाता है | परन्तु इस प्रकार के अर्थ करने की जरूरत नहीं | इस वाक्य में प्रयुक्त 'भवति' क्रिया से स्पष्ट है कि ब्रह्मवित् पहले ब्रह्म नहीं था, अब हुआ है तो वह आदि ब्रह्म हुआ, परन्तु जिस ब्रह्म के जानने से ब्रह्मवित् हुआ वह अनादि ब्रह्म है | यह अन्तर सदैव ब्रह्म और ब्रह्मवित् में बना रहता है |

(अब गतांक से आगे)

अन्धन्त‌मः प्रविशन्ति ये Sविद्यामुपासते |
ततो भूयं इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः ||9||

भावार्थ
ये.....................जो
अविद्याम...........कर्म को (ज्ञान की उपेक्षा करके)
उपासते............सेवन करते हैं,, वे
अन्धन्त‌मः.........गहरे अन्धकार में
प्रविशन्ति..........प्रवेश करते हैं |
ये उ..................और जो (कर्म की उपेक्षा करके केवल‌)
विद्यायाम्..........ज्ञान में
रताः..................रमते हैं
वे......................वे
ततः..................उससे
भूयः इव...........भी अधिक
तमः..................अन्धकार को प्राप्त होते हैं |

अन्यदेवाहुर्विद्याया अन्यदाहुरविद्याया: |
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ||10||

भावार्थ
विद्यायाः.............ज्ञान का
अन्यत् एव........और ही फल
आहुः.................कहते हैं
अविद्याया...........कर्म का
अन्यत् एव........और ही फल
इति नः.............ऐसा हम
धीराणाम्............धीर पुरुषों से
शुश्रुम...............सुनते हैं |
ये.....................जो हमारे लिये
तत्...................उसका
विचच‌क्षिरे.........उपदेश करते हैं |

विद्याञ्चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयँ सह |
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाSमृतमश्नुते ||11||

भावार्थ
यः.....................जो
विद्याम् च अविद्याम् च...ज्ञान और कर्म
तत् उभयम्..........इन दोनों को
सह...................साथ साथ
वेद...................जानता है वह
अविद्यया..............कर्म से मृत्यु को
तीर्त्वा.................तैर कर
विद्यया................ज्ञान से
अमृतम्..............अमरता को
अश्नुते................प्राप्त होता है |

व्याख्या
इन मन्त्रों में विद्या और अविद्या का महत्वपूर्ण सिद्धान्त वर्णन किया गया है | यहीं से उपनिष्द् का तीसरा भाग प्रारम्भ होता है, जिसमें मनुष्य के कर्त्तव्य का विधान किया गया है |

विद्या ज्ञान को कहते हैं, यह तो निर्विवाद ही है | अविद्या के दो अर्थ किये जाते हैं - एक पारिभाषिक, दूसरा योगिक | दर्शनों में प्रायः अविद्या का पारिभाषिक अर्थ 'मिथ्याज्ञान‌' लिया जाता है| परन्तु अविद्या का यौगिक अर्थ 'विद्या से भिन्न' है, (अविद्या) जो विद्या अर्थात् ज्ञान नहीं है | जो ज्ञान नहीं वह क्या है ? इस प्रश्न‌ का उत्तर इन मन्त्रों का देवता (मन्त्र का विषय‌) देता है | इन मन्त्रों का देवता आत्मा है | आत्मा के स्वाभाविक गुण ज्ञान और कर्म ही हैं | इच्छा द्वेषादि चार चिन्ह हैं जो, शरीर में आत्मा के होने के समझे जाते हैं | श‌रीर की बनावट भी आत्मा के स्वाभाविक गुणों की साक्षी है | शरीर में दो प्रकार की इन्द्रियाँ हैं - ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय | ज्ञानेन्द्रियाँ आत्मा के कर्म गुण को सार्थक करने के लिए हैं | यदि तीसरा कोई स्वाभाविक गुण और होता तो शरीर में तीसरे प्रकार का अन्य इन्द्रिय‍-समुदाय उस गुण के साधन रूप होने के लिए बना हुआ दृष्टिगोचर होता | अतः आत्मा के स्वाभाविक गुण ज्ञान और कर्म दो ही हैं | विद्या ज्ञान को कहते हैं जैसा कहा जा चुका है और ज्ञान से भिन्न का नाम मन्त्र में अविद्या प्रयुक्त हुआ है | ज्ञान से भिन्न कर्म ही है | इसलिए स्पष्ट हो गया कि अविद्या का अर्थ कर्म है | अब इन मन्त्रों का अर्थ भी साफ हो गया कि केवल ज्ञान का या केवल कर्म का सेवन करना, अन्धकार में पड़ना है | सिद्धान्त यह है कि विज्ञान और कर्म दोनों का प्रयोग साथ-साथ करना चाहिए | वेदों का यह शाश्वत सिद्धांत है जो तीनों कालों में एक जैसी उपयोगिता रखता है | ज्ञान उपलब्ध करके उसको कार्य में परिणित करना ही मनुष्य-जीवन का सबसे बड़ा उद्देष्य है| इसलिए वेद नित्योपयोगी (Uptodate) समझे जाते हैं |‌

मन्त्रों की विशेषता

इन मन्त्रों की एक विशेषता है, और यही विशेषता वेदों की महता की द्योतक है | वह विशेषता यह है कि अन्तिम मन्त्र में, ज्ञान और कर्म का उद्देष्य वर्णन कर दिया गया है, और यह उद्देश्य सबसे बड़े बन्धन - ‍‍मृत्यु के बन्धन - से पार होकर अमरता को प्राप्त करना है | आधुनिक कर्म और ज्ञान तथा वेदों के कर्म और ज्ञान में यही सबसे बड़ा विभेदक अन्तर है | आधुनिक ज्ञान और कर्म, साइन्स (Science) और आर्ट (Art) हैं |एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (Encyclopaedia Britannica) के शब्दों में (Science consist in knowing) और (Art consist in doing) अर्थात साइन्स ज्ञान और आर्ट कर्म का ही नाम है |

क्रमशः