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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (10)

प्रार्थना विषय
तमीशान जग‌तस्तस्थुषस्पतिं
धियंजिन्मवसे हूमहे वयम् |
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे
रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ||10||
ऋ. 1|6|15|5||

व्याख्यान

हे सर्वाधिस्वामिन‌ ! आप ही चर और अचर जगत् के ईशान (रचने वाले) हो "धियंजिन्वम्" सर्व विद्यामय विज्ञान‌ स्वरूप बुद्धि को प्रकाशित करने वाले प्रीणनीयस्वरूप "पूषा" सबके पोषक हो, उन आपका हम "नः, अवसे" अपनी रक्षा के लिए "हूमहे" आह्वान करते हैं | "यथा" जिस प्रकार से आप हमारे विद्यादि धनों की वृद्धि व रक्षा के लिए "अदब्धः रक्षिता" निरालस रक्षा करने में तत्पर हो वैसे ही कृपा करके आप "स्वस्तये" हमारी स्वस्थता के लिए "पायुः" निरन्तर रक्षक (विनाश निवारक‌) हो | आपसे पालित हम लोग, सदैव उत्तम कामों में उन्नति और आनन्द को प्राप्त हों ||10||