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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (11)

स्तुति विषय
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे |
पृथिव्याः सप्त धामभिः ||11||
ऋ. 1|2|7|16||

व्याख्यान

हे "देवाः" विद्वानो ! "विष्णुः" सर्वत्र व्यापक परमेश्वर ने सब जीवों को पाप तथा पुण्य का फल भोगने और सब पदार्थों के स्थिर होने के लिए, पृथ्वी से लेके सप्तविध लोक "धामाभि:"
अर्थात ऊंचे नींचे स्थानों से संयुक्त बनाये तथा गायत्री आदि सात छन्दों से विस्तृत विद्यायुक्त वेद को भी बनाया | उन लोकों के साथ वर्त्तमान व्यापक ईश्वर ने "यतः" जिस सामर्थ्य से सब लोकों को रचा है "अतः"(सामर्थ्यात्) उस सामर्थ्य से हम लोगों की रक्षा करें | हे विद्वानो । तुम लोग भी उसी विष्णु के उपदेश से हमारी रक्षा करो | कैसा है यह विष्णु ? जिसने इस सब जगत को "विचक्रमे" विविध प्रकार से रचा है उसकी नित्य भक्ति करो ||11||