आओ प्रभु से ही मांगें अपने शरीर का स्वास्थ्य
आज अत्यन्त विषम स्थिती भारत देश में छायी है | एक उत्तेजक घटनाक्रम, एक विसफोटक स्थिती, एक उथल पुथल, एक भागदोड़, एक बड़ती हुई अस्थिरता... आदि आदि |
कैसे करें ऐसे में हम अपना व देश का कल्याण ?
देखिये मृत्यु से जब तक हम भयभीत रहेंगें, वह हमें घेरती रहेगी | पर जैसे ही हम मृत्यु को अंगूठा दिखा देते हैं , भय मुश्क कफूर हो जाता है, गायब हो जाता है |
तो क्यों न हम मृत्यु को ही भयभीत कर दें ?
हमने गीता पड़ी है, हमने वेद पड़े हैं, हम जानते हैं, हम मानते हैं हम अमर हैं, हम इस यन्त्र को प्रयोग करते हैं और यह यन्त्र हमें एक बार नहीं, बार बार मिलता है तो फिर किस बात का हमें दुख, भय, गम ?
हम तो लड़ेंगे इस मृत्यु से, जब चाहे ये हमसे लड़ ले |
आइये अब इस मृत्यु के भय को एक तरफ रखते हुए हम अपने प्रभु से, अपने इस यन्त्र को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए पार्थना करें | जब वह हमारे साथ है तो फिर किस वस्तु की कमीं हमें रह सकती है ?
ओं वाक् वाक् | ओं प्राणः प्राणः | ओं चक्षुश्चक्षुः , ओं क्षोत्रं क्षोत्रम् | ओं नाभिः | ओं हृदयम् | ओं कण्ठः | ओं शिर: | ओं बहुभ्यां यशोबलम् | ओं करतलकरपृष्ठे |
मेरा हर अंग ,प्रत्यङ्ग, सुन्दर , स्वस्थ, सुडोल, बलशाली और यशस्वी बने | एक एक अंग और प्रत्यङ्ग प्राणों से भरपूर हो |
ओं भूः पुनातु शिरसि |ओं भुवः पुनातु नेत्रयो | ओं स्वः पुनातु कण्ठे |ओं मह: पुनातु हृदये | ओं जनः पुनातु नाभ्याम् | ओं तपः पुनातु पादयोः | ओं सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि | ओं खम्ब्रह्म पुनातु सर्वत्र |
हर अंग मे चलने वाले विचार शुद्ध , पवित्र , उत्तम हों | बुद्धि पवित्र ज्ञान से भरपूर हो , पाँव तप से , नाभि उत्तम पोषक तत्वों की जनक हो, कण्ठ सुखप्रदात्री वाणी का जनक हो , नेत्र उत्तम विचारों को दर्शायें , हृदय महान हो , सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ हो , पवित्र हो |
बस मेरे महान प्रभु यह सब हो तो फिर मैं पूरे ब्रह्माण्ड के विस्तार में अपने आप को बसा हुआ अनुभव करूंगा तेरे आश्रय में हर पल , हर घड़ी | सदा निर्भय होकर ||
उपरोक्त मन्त्रों की कविता मय व्याख्या (स्वामी अमृतानन्द जी सरस्वती द्वारा) -
"दीन दयाल, दया के सागर, दीजे हमको बुद्धि उजागर |
ज्ञान कर्म दश इन्द्रिय मेरे, कभी न आवें पाप के नेरे |
रस भरी शुभ बोलें वाणी, प्राण पवित्र करो हे स्वामी |
दो आँखें दो कान पिताजी, देखें सुनें पवित्र कथा ही|
नाभि, हृदय कण्ठ भुजायें, हाथों से न पाप कमायें |
यश बल जितना मिले प्रभु जी, शुभ कर्मों में लगे सदा ही |"
"प्राणों से हे प्यारे भगवन, शिर को करो पवित्र निशदिन |
सर्वव्यापक सुख के दाता, करो पवित्र कण्ठ विधाता |
महा प्रभु तुम ईश हमारे, हृदय करो पवित्र हमारे |
करो पालना जगत बनाकर, नाभि मेरी करो पवित्र |
दण्ड दाता प्रभु ज्ञान भण्डारा, रहे पवित्र मार्ग हमारा |
सत्य स्वरूप अविनाशी ईश्वर, पुनः पवित्र करो मेरा शिर |
महा प्रभु सर्वत्र व्यापक, करो पवित्र बुद्धि आदिक |"
{नोट 1. सन्ध्या व यज्ञ को सही, सही सीखने हेतु किसी अच्छी सन्ध्या व यज्ञ की सीडी का प्रयोग कर सकते हैं , जिसमें शुद्ध उच्चारण हो | ऐसी ही एक उत्तम सीडी है 'दर्शन योग महाविद्यालय , रोजड, गुजरात से उपलब्ध |
2. उपरोक्त मन्त्रों की कवितामय व्याख्या स्वामी अमृतानन्द जी सरस्वती के 'ब्रह्मस्त्रोत्र' से साभार उद्धृत की गयी है |}
