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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (12)

.....वह विशेषता यह है कि अन्तिम मन्त्र में, ज्ञान और कर्म का उद्देष्य वर्णन कर दिया गया है, और यह उद्देश्य सबसे बड़े बन्धन - ‍मृत्यु के बन्धन - से पार होकर अमरता को प्राप्त करना है | आधुनिक कर्म और ज्ञान तथा वेदों के कर्म और ज्ञान में यही सबसे बड़ा विभेदक अन्तर है | आधुनिक ज्ञान और कर्म, साइन्स (Science) और आर्ट (Art) हैं | एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (Encyclopaedia Britannica) के शब्दों में (Science consist in knowing) और (Art consist in doing) अर्थात साइन्स ज्ञान और आर्ट कर्म का ही नाम है |
(अब गतांक से आगे)

आधुनिक ज्ञान और कर्म उद्देश्य रहित हैं -

परन्तु इन ज्ञान और कर्म का कोई उद्देश्य नही है | इसलिए ये मृत्यु के बन्धन को छुड़ाने की जगह उस बन्धन को और भी दृड़ करने में लगे हुए हैं | इस समय साइन्स के एक बड़े विभाग का कार्य, युद्ध से सम्बन्धित (Chemical Warfare Service) केवल यह है कि नई नई जहरीली गैसों और बम बनाने के तरीकों की खोज और ईजाद करे | टी.ए. एडीसन (T.A. Edison) महाशय जो वर्तमान काल के उच्च कोटी के वैज्ञानिकों में समझे जाते हैं, लिखते हैं कि जहरीली गैस - जो अमरीका में बनाई गई थी और जिसे जर्मन और जापानी वैज्ञानिकों ने परिष्कृत किया है - ऐसी घातक है कि यदि वह एक छोटे हवाई जहाज के बेड़े से लण्डन नगर पर, जो पृथ्वी का सबसे बड़ा नगर है और जिसकी आबादी 80 लाख के लगभग है - छोड़ी जावे, तो तीन घण्टे में उसे नष्ट कर देगी | अमरीका की 1918 20 तक की उपर्युक्त विभाग की रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रीति से वर्णित है कि जहरीली गैसे अमरीका में 810 टन, इंग्लैण्ड में 410 टन और जर्मनी में 210 टन प्रति सप्ताह तैयार होती हैं | ये सब गैसें इसलिए जमा की जा रही हैं और एटामिक बम इसलिए बनाया गया है कि भावी, अनिवार्य युद्ध में शीघ्र से शीघ्र, अधिक से अधिक मनुष्यों का संहार किया जा सके | अस्तु हमने देख लिया कि उद्देश्यरहित होने से, आधुनिक पश्चिमी जगत् के ज्ञान और कर्म, किस प्रकार प्राणियों का संहार करने में लगे हुए हैं, जब कि वेदों के ज्ञान और कर्म मनुष्यों को अमर बनाने के उत्कृष्टतम साधन हैं |

ज्ञान से कर्म की विशेषता -

पहले मन्त्र में एक बात और भी है, जिस पर ध्यान देना चाहिए और वह बात यह है कि मन्त्र में कहा गया है कि जो केवल ज्ञान का सेवन करते हैं, वह उनसे अधिक अन्धकार में पड़ते हैं जो केवल कर्म का आश्रय लेते हैं | इसका कारण यह है कि ज्ञानमात्र का कोई फल नहीं मिलता, परन्तु कर्म जितना भी करेगा चाहे वह कितना भी उलटा सीधा क्यों न हो, उसका कुछ न कुछ फल अवष्य मिलता है |इसलिए उपनिषद् की शिक्षाओं में कर्म का बहुत ऊँचा स्थान है, यह बात कभी किसी अध्यात्म विद्या के विद्यार्थी को नहीं भूलनी चाहिए | यहीं से गीताकार ने कर्मयोग की शिक्षा ली है |

मनुष्य के पहले कर्त्तव्य का विधान विद्या-अविद्या सम्बन्धी तीन मन्त्रों मे कर दिया गया | इस कर्म और् ज्ञान का क्षेत्र क्या होना चाहिए, इसका वर्णन आगे के तीन मन्त्रों में किया गया है | इन मन्त्रों का भाव समझना और उनमें वर्णित शिक्षानुकूल आचरण करना मनुष्य का दूसरा कर्त्तव्य है | इन दो कर्त्तव्यों से भिन्न मनुष्य जीवन का कोई भी ऐसा कर्त्तव्य, जो इसके कल्याण के लिए अपेक्षित हो, बाकी नहीं रहता | इन्हीं में सबका समावेश है | दूसरे कर्त्तव्य के विधायक तीन मन्त्र ये हैं :-

अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये Sसम्भूतिमुपासते |
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँ रताः ||12||

भाषार्थ

ये.....................जो
असम्भूतिम्...........कारण प्रकृति - कारण शरीर का (अन्य शरीरों की उपेक्षा करके)
उपासते............सेवन करते हैं, वे
अन्धन्तमः.........गहरे अन्धकार में
प्रविशन्ति..........प्रवेश करते हैं |
ये उ..................और जो
सम्भूत्याम्..........कार्य प्रकृति - सूक्ष्म शरीर + स्थूल शरीर में (कारण शरीरों की उपेक्षा करके)
रताः..................रमते हैं
वे......................वे
ततः..................उससे
भूय, इव...........भी अधिक
तमः..................अन्धकार को प्राप्त होते हैं |

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् |
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ||13||||

भाषार्थ

सम्भवात्............कार्य्य प्रकृति - स्थूल शरीर का
अन्यत् एव........और ही फल
आहुः.................कहते हैं
असम्भवात्...........और कारण प्रकृति - कारण शरीर से
अन्यत् एव........और ही फल,
आहुः.................कहते हैं |
इति .................इस प्रकार
धीराणाम्............धीर पुरुषों के(वचन)
शुश्रुम...............हम सुनते हैं |
ये.....................जो
नः....................हमारे लिए
तत्...................उन (वचनों) का
विचचक्षिरे.........उपदेश कर गये हैं |

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय् सह |
विनाशेन मृत्युतीर्त्वा सम्भूत्याSमृतमश्नुते ||14||||

भावार्थ

यः.....................जो कोई
सम्भूतिम्.............कार्य रूप प्रकृति = सूक्ष्म * स्थूल शरीर
च......................और
विनाशम्...............कारण रूप प्रकृति = कारण शरीर
तत् उभयम्..........उन दोनों को
सह...................साथ साथ
वेद...................जानता है वह
विनाशेन...............कारण शरीर से
मृत्युम्.................मृत्यु को
तीर्त्वा.................तैर कर
सम्भूत्या..............कार्य शरीर से
अमृतम्..............अमरता को
अश्नुते................प्राप्त होता है |

व्याख्या -

इन मन्त्रों का मुख्य विषय सम्भूति और असम्भूति का ज्ञान है | सम्भूति कार्य प्रकृति और असम्भूति कारण स्वरूप प्रकृति को कहते हैं |तीसरे मन्त्र में असम्भूति की जगह विनाश शब्द आया है | 'वि' उपसर्ग 'हाँ' और 'नहीं' दोनो अर्थों में आता है | जैसे विधर्म और विदेश आदि | यहाँ भी 'वि' निषेधक ही है | अर्थात जिसका नाश न हो सके वह विनाश है | इस प्रकार यह शब्द असम्भूति का पर्यायवाचक ही ठहरता है, परन्तु ये सम्भूति और असम्भूति शब्द जब आत्मा से सम्बन्धित होते हैं, तब उनके अर्थ कारण और कार्य होते हैं | कारण शरीर की कल्पना घटाकाश - मठाकाशवत् है | जगत् में व्यापक कारण रूप प्रकृति का जो अंश हमारे अन्दर है उसी का कल्पित नाम कारण शरीर है | कार्य शरीर दो हैं - सूक्ष्म और स्थूल | इन दोनों के काम पृथक पृथक हैं -
1. स्थूल शरीर - सूक्ष्म शरीर का साधन है | उसी के द्वारा विषयमय जगत् से, सूक्ष्म शरीर का संबन्ध होता है, स्थूल शरीर के विकसित और पुष्ट होने से शारीरिकोन्न्ति होती है | राममूर्ति और सैण्डो आदि इसके उदाहरण हैं |

2. सूक्ष्म शरीर 17 वस्तुओं के समुदाय का नाम है -
5 ज्ञानेन्द्रिय
5 सूक्ष्म विषय = तन्मात्रा (श्ब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)
5 प्राण (प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान)
1 मन
1 बुद्धि
योग = 17

सूक्ष्म शरीर के विकसित और पुष्ट होने से मानसिकोन्न्ति होती है | यही मानसिकोन्न्ति किये हुए पुरुष जाती के नेता, राजा और उच्च राज्य कर्मचारी हुआ करते हैं और कारण शरीर के विकसित और पुष्ट होने से मनुष्य मे ईश प्रेम आता है और वह भक्त और योगी बना करता है | आशय यह है कि तीनों प्रकार के शरीरों का इतना विवरण जान लेने से इन मन्त्रों के अर्थ समझ लेनें में सुगमता हो जाती है | मन्त्र कहता है कि यदि स्थूल और सूक्ष्म शरीरों की उपेक्षा करके केवल कारण शरीर की उन्नति चाहते हो तो अन्धकार में पड़ना पड़ेगा, क्योंकि बिना स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के उन्नत हुए कारण शरीर की उन्नति प्राप्त नहीं हो सकती | और यदि कारण शरीर की उपेक्षा करके केवल कार्य शरीर = स्थूल + सूक्ष्म शरीरों को उन्नत करना चाहते हो, तो भी भविष्य अन्धकारमय होगा, क्योंकि इससे नास्तिकता उत्पन्न होगी, जैसे चार्वाक और यूरोप के प्रकृतिवादी नास्तिक विद्वान | इसीलिए तीसरे मन्त्र में, सिद्धान्त और कर्त्तव्य रूप से, यह शिक्षा दी गई है कि दोनों प्रकार के शरीरों की उन्नति साथ साथ होनीं चाहिये, तभी मृत्यु का बन्धन टूट सकता है | मृत्यु का बन्धन किस प्रकार छूट सकता है यही अन्तिम प्रश्न है, जो इन मन्त्रों के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है |

क्रमशः