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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

परिच्छिन्न आत्मा

ओउम् ! अव्यस्रश्च व्यचसश्च बिलं वि ष्यामि मायया |
ताभ्यामुद् धृत्य वेदमथ कर्म्माणि कृण्महे ||

अथर्ववेद 19|68|1

शब्दार्थ -

अव्यस:............अव्यापक, परिच्छिन्न (जीवात्मा)
च + च.............और
व्यचसः..............व्यापक (परमात्मा) के
बिलम्...............भेद को, रहस्य को, ठिकाने को
मायया...............बुद्धि से
वि + स्यामि........खोलता हूँ |
ताभ्याम्............उन दोनों से अथवा उन दोनों के लिए
वेदम्................वेद को
उद् धृत्य...........ग्रहण करके
अथ..................इसके अनन्तर
कर्म्माणि...........कर्मों को
कृण्महे..............हम करते हैं |

व्याख्या -

जीवात्मा अथवा अपना आपा तथा परमात्मा के सम्बन्ध में संसार में बड़ा विवाद है |कई लोग तो इन दोनों की सत्ता ही स्वीकार नहीं करते | जो स्वीकार करते हैं उनमें भी इनके सम्बन्ध में एकमत नहीं है | परमात्मा को कोई सातवें आसमान पर , कोई चौथे आसमान पर, कोई क्षीरसागर में और कोई अन्यत्र कहीं बतलाकर उसको परिच्छिन्न, अव्यापक, एकदेशी बतला रहा है | एकदेशी अवश्यमेव अल्पज्ञ और अल्प सामर्थ्यवाला होगा, उससे इस विशाल ब्रह्माण्ड की रचना, पालना, संहारणा नहीं हो सकती | इस दोष का निराकरण करने के विचार ही से मानो वेद में कहा गया है कि वह व्यापक है |जीव को अव्यापक बतलाया गया है | इन दोनों का भेद, इनका रहस्य ज्ञान से जाना जा सकता है, इसीलिए कहा बिलं विष्यामि मायया बुद्धि से, ज्ञान से इनका रहस्य खोलता हूँ |

प्रत्यक्ष पदार्थों के विषय में भी बहुधा विवाद हुआ करते हैं, परोक्ष पदार्थों का तो कहना ही क्या है | किन्तु भगवान नें कृपा करके जो ज्ञान दिया है, उससे काम लो, दोनों के भेद को, ठिकाने को ज्ञान से खोलो | ऋषि ने कहा भी है -
हृदा मनीषा मनसाSभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति | श्वेताश्वतरोपनिषद् 4|17

हृदय से, बुद्धि से तथा मन से इसका बोध होता है | जो इस बात को जान लेते हैं, तो वे अमृत हो जाते हैं, मौत से निर्भय हो जाते हैं |

जिन्होंने उस अविनाशी, अमर को जान लिया उन्हें मृत्यु भय कहाँ रहा ? किन्तु उसे जानने के लिए मन, बुद्धि तथा हृदय सभी का सहयोग होना चाहिए | मन और बुद्धि, मनन और अध्यवसाय उनका निश्चय कराएंगे | मस्तिष्क को तर्क चुप करा सकता है, किन्तु सूक्ष्म भावनाओं के धनी हृदय ने उसे धारण न किया तो फिर नास्तिक्ता के गहरे गर्त में गिरना होगा | इसलिए हृदय को भी साथ मिलाओ |
ऋषि श्वेताश्वतर ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा -

अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः |
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेण चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोSपि दृष्टः ||5|8

जो ज्ञानगम्य है , सूर्य समान तेजस्वी है, संकल्प करता है, अहंकारवान है, वह अत्यन्त सूक्ष्म आत्मा अपर है, वह बुद्धि तथा अपने गुणों से दीखता है |

सचमुच वह अपर है पर तो परमात्मा है | बुद्धि के गुण आत्मा का ज्ञान करा रहे हैं |इच्छा-द्वेष, सुख-दुख, ज्ञान और प्रयत्न, ये आत्मा के गुण आत्मा का अनुमान करा रहे हैं | इस अनुमान से आत्मा को जानकर जो साधनों का अनुष्ठान करता है, उसे आत्मा का साक्षात्कार, प्रत्यक्ष भी होता है, तभी कहा अपरोSपि दृष्टः = अपर आत्मा के भी दर्शन होते हैं |

इन्हीं ऋषिप्रवर ने आत्मा का परिमाण बताया है -
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च|
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ||
-5|9
बाल के अगले हिस्से के सो टुकड़े कर दिये जाएँ, उस सूक्ष्म सौवें हिस्से के भी सौ हिस्से कर दिये जाएँ, उस सूक्ष्म भाग के समान जीव है, किन्तु उसमें सामर्थ्य बहुत है |

महर्षि दयानन्द ने भी कहा है -
जीव एक सूक्ष्म पदार्थ है जो एक परमाणु में भी रह सकता है उसकी शक्तियाँ शरीर में प्राण्, बिजुली, नाड़ी आदि के साथ संयुक्त होकर रहती हैं, उनसे सब शरीर का वर्त्तमान जानता है |
- सत्यार्थप्रकाश, द्वादश सम्मुलास

श्वेताश्वतर और दयानन्द दोनों नें यह रहस्य वेद तथा योग द्वारा जाना | अथर्ववेद में कहा है -
बालादेकमणीयस्कमुतैकं नेव दृश्यते |
ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया ||
अथर्ववेद 10|8|25

एक (जीवात्मा) बाल से भी अधिक सूक्ष्म है, और एक (प्रकृति) मानो नहीं दीखती है, उससे अधिक सूक्ष्म और व्यापक जो परमात्मा देवता है, वह मेरी प्यारी है अर्थात् परमात्मा जीव से सूक्ष्म और जीव में व्यापक है | वह सदा असङ्ग रहनेवाला है, अतः जीव को उससे प्यार करना चाहिए | कितना कठिन और कितना सरल है यह कार्य्य ! यथार्थ ज्ञान के बिना यह सिद्ध नहीं होता |

ध्यान दीजिए, पहले वेद, पीछे कर्म्म अर्थात ज्ञान के बिना कर्म्म का अनुष्ठान हो ही नहीं सकता | तभी शास्त्रों में कर्म्म से पूर्व ज्ञान का नाम आता है |

उत्तरार्ध एक और गम्भीर तत्व का संकेत कर रहा है | ज्ञान का पर्य्यावसान अनुष्ठान है | वह ज्ञान जिसे कर्म्म में परिणित न किया जा सके, वह ज्ञान जिससे कर्म्म करने में सहायता न मिले, ज्ञान नहीं है, ज्ञानाभास है | इससे स्पष्ट होता है कि वेद कर्म्मण्यवाद का पोषक है, कर्मत्याग का नहीं | उचित भी यही है | परिच्छिन्न जीवात्मा कर्म के बिना रह नहीं सकता | वह अपने चहुँ और के पदार्थ जानना चाहता है , उसके लिए उसे गति करनी होती है | गति का नाम ही कर्म्म है अर्थात कर्म आत्मा का स्वभाव है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)