Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सृष्टि के तत्त्व भगवान के आदेश से चलते हैं

ओउम् ! अहं भूमिमददामार्य्यायाSहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय |
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतमायन् ||

ऋ. 4|26|2||

शब्दार्थ

अहम्...................मै‍,
भूमिम्..................भूमि
अर्य्याय.................आर्य्य को
अददाम्.................देता हूँ,
अहम्...................मैं
दाशुषे...................दाता
मर्त्याय.................मनुष्य को
वृष्टिम्..................वृष्टि देता हूँ |
अहम्..................मैं ही
वावशानाः...............चाहने योग्य
अपः......................जलों को, सूक्ष्म‌ तत्त्वों को
अनयम्.................चलाता हूँ,
देवासः...................देव, सृष्टि के तत्त्व
मम......................मेरे
केतम् + अनु...........संकेत के अनुकूल
आ + अयऩ‌............चलते हैं |

व्याख्या -

भगवान आदेश करते हैं - मैनें भूमि आर्य्यों को दी है | परन्तु भूमि का बहुत भाग तो अनार्य्यों के पास है | बाह्मणग्रन्थों में बहुत सुन्दर रीति से इस समस्या को सुलझाया गया है | वहाँ लिखा है - देवों और असुरों में भूमि के सम्बन्ध में झगड़ा हुआ | सारी भूमि पर असुरों ने अधिकार कर लिया | देवों नें यज्ञ‌ को आगे किया और असुरों से कहा कि हमें यज्ञ के लिए भूमि दो | यज्ञ तो बहुत छोटा था | असुरों ने भूमि दे दी | बस फिर क्या था, यज्ञ बहुत बड़ गया, सारी भूमि पर देवों का अधिकार हो गया | वहाँ लिखा है कि असुरों की हार का कारण था स्वार्थ और देवों की विजय का मूल था स्वार्थत्याग देवा अन्योSन्यस्मिञ्जुह्वतश्चेरुः = देव अपने में हवन न करते थे, वरन् एक दूसरे में होम करते हुए, विचरते थे, खाते थे, अर्थात् देव यज्ञशील हैं | यज्ञ में प्रत्येक आहुति के साथ इदं न मम (यह मेरा नहीं) लगा है | यज्ञ करने वाले को वेद आर्य्य कहता है यजमानमार्य्यम् = ऋग्वेद् | सार निकला, भगवान ने भूमि स्वार्थ-त्यागियों को दी है, जिसमें जितनी स्वार्थत्याग की मात्रा होगी, उतना ही वह भूमि का अधिकारी होगा | इसी भाव को इसी मन्त्र के दूसरे चरण में स्पष्ट करके कहा है -
अहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय = मैं दानी मनुष्य को वृष्टि देता हूँ | वेद दान पर बल देता है | अराति = कंजूस की वेद में बहुत निन्दा है | स्वार्थत्याग वैदिक धर्म्म का मर्म है |

संस्कृत में जल को जीवन कहते हैं | भगवान् कहते हैं अहमपो अनयं वावशानाः = मैं चाहने योग्य जलों को चलाता हूँ अर्थात् जीवन की बागडोर भगवान के हाथ में है | नचिकेता नें ठीक ही कहा था जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वम् कठोपनिषद् 1|1|27|| भगवान ने जितना योग निश्चित किया है, उतना ही जिएँगे | जीवन या जल की क्या कहते हो, सभी मम देवासो अनु केतमायन् = देव मेरे संकेत पर चलते हैं |

सूर्य, चाँद, आग, हवा, पानी, ग्रह-उपग्रह, सृष्टि के सभी पदार्थ उसके नियम से बँधे चलते हैं | आंख रूप ही देखेगी, गन्ध नहीं सूँघ सकेगी | कान शब्द ही सुनेगा, रूप नहीं देखेगा, गन्ध नहीं सूँघेगा | उसका केत = संकेत ही ऐसा है |

जब सभी उसके संकेत पर चलते हैं, तब आओ, हम भी उसके संकेत पर चलें | वेद से उसका संकेत जानें |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)