पांच हजार साल से सोने वालो जागो -

बालमीकि रामायण में एक कथा आती है कि जब नील इंजीनियर लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र पर पुल बान्ध रहे थे, तो एक गिलहरी भी अपने छोटे छोटे पंजों में रेत के कुछ कण उठा उठा कर पुल बनाने वालों के पास प‍हुंचा रही थी तब किसी ने गिलहरी से पूछा कि तुम यह क्या कर रही हो | तुम्हारे इस प्रयत्न से पुल बनाने में क्या सहायता मिल रही है | तब उसने जो जवाब दिया, वह हर एक मनुष्य को स्मरण रखने योग्य है | "गिलहरी ने कहा कि धर्म के काम में जितनी भी सहायता जिससे बन सके, उतनी सहायता करने से कभी पीछे न हटें |यह न समझें कि मेरी छोटी सी सहायता से क्या होगा | परन्तु अपनी शक्ति के अनुसार धर्म के कार्यों में योग देना ही धर्म है |"
और

महर्षि दयानन्द जी महाराज जब मुरादाबाद प्रचार कर रहे थे तो उनके सत्संग में एक ऐसा निर्धन आदमी अत्यन्त श्रद्धा से आया करता था जो रात को चोकीदारी की नौकरी करके अपना निर्वाह करता था | महर्षि जी के सत्संग से वह इतना प्रभावित हुआ कि रात को अपने चौकीदारी का धर्म निभाते हुए वह यह शब्द उच्चारण किया करता था, "पांच हजार साल से सोने वाले जागो" जब कोई इसका कारण पूछता तो वह महर्षि के अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने की प्रेरणा करता था, और अपनी सारी आयु में उसने कितने ही मनुष्यों को सत्यार्थ प्रकाश पढ़ाकर वैदिक धर्मीं बना दिया था | रामायण की गिलहरी की भान्ति इस चोकीदार ने अपनी शक्ति के अनुसार धर्म प्रचार में योग दिया था | क्या हम भी इस तरह धर्म प्रचार में यथाशक्ति अपना योग नहीं दे सकते |(अवष्य दे सकते हैं यदि इस और प्रवृति हो तो) महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में भारतवर्ष के ह्रास का हेतु महाभारत का युद्ध ही बताया | महर्षि लिखते हैं ' ऐसे शिरोमणि देश को महाभारत के युद्ध नें ऐसा धक्का दिया है कि अब तक भी यह अपनी पूर्व दशा में नहीं आया | क्योंकि जब भाई भाई को मारने लगे तो नाश होने में क्या सन्देह है | "विनाश काले विपरीत बुद्धि" यह किसी कवि का वचन है | जब नाश होने का समय निकट आता है, तब उल्टी बुद्धि होकर उल्टे काम करते हैं | कोई उनको सीधा समझावे तो उल्टा मनते हैं | और जो उल्टा समझावे वह सीधा समझते हैं | जब बड़े बड़े विद्वान राजा महाराजा ऋषि महर्षि लोग महाभारत युद्ध में मारे गये और बहुत से मर गये तब विद्या और वैदिक धर्म का प्रचार नष्ट हो गया | ईर्षा, द्वेश, अभिमान आपस में करने लगे | जो बलवान हुआ वह देश को दबा कर राजा बन बैठा | सर्वत्र आर्यावर्त्त देश में खण्डबण्ड राज्य हो गया पुनः द्वीप द्वीपान्तर के राज्य की व्यवस्था कौन करे | ब्राह्मण लोग विद्या से हीन होने लगे और क्षत्रिय वैश्य शूद्र के होने में तो कथा ही क्या कहनी | जो परम्परा से वेदादि शास्त्रों का पढ़ना पढ़ाना था वह भी छूट गया | वर्ण व्यवस्था गुण कर्म से न रह कर ‌जन्म से सिद्ध होने लगी जिससे ब्राह्मण लोग मूर्ख, विषयी , कपटी, लम्पट आदि हो गये | और् अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ब्रह्मवाक्य जनार्दन का घोष जारी कर दिया यानि जो ब्राह्मण कह दे वही ठीक है | इससे सारा भारत अविद्या की गहरी निद्रा में चला गया और ऐसी निद्रावस्था में इस भारत भूमि पर बाहर से आक्रमण होने शुरु हो गए | पहले यूनानियों ने फिर मुसलमानों नें हमले पर हमले करके इस देश को खूब लूटा और फिर अंग्रेजों नें | हजारों वर्ष तक यह देश गैरों की गुलामी तले फंसा रहा | और विदेशी न केवल अनगिनित धन की राशि ही यहां से लूट कर ले गये | अपितु लाखों करोड़ों हिन्दुओं को मुसलमान और ईसाई भी बना लिया | इस तरह भारत में लूट मची रही | अब पांच हजार वर्ष के बाद बाल ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द जी ने आकर सोई हुई भारतीय जाती को हिलोरें दे दे कर जगाया है | किसी कवि ने इस उपकार की तरफ संकेत करते हुए ही कहा है -

'धन्य है तुझ को ऐ ऋषि तूने हमें जगा दिया |
सो सो के लुट चुके थे हम तूने हमें बचा लिया |'

और महर्षि का वह श्रद्धालु चौकीदार ठीक ही कहता था -

'पांच हजार साल से सोने वाले जागो '

(श्री कुन्दन लाल आर्य चूनियां वाला कृत‌
'पूर्ण पुरुष का विचित्र जीवन चरित्र' से साभार उद्दत)

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I could sell 200 copies of Satyarth Prakash in the recently held Kannada literary conference from 4th to 7th o feb09 at a place called Chitradurga which is a Dist. H.qs in Karnataka. Each buyer was explained why he should buy this book and the whole exercise was very rewarding.

Wonderful work. Dhanyavad!

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Sh

Sh Vasudevaraoji
Namanstey
It is a VERY HEARTENING and a GREAT NEWS at the same time. A Big Effort ! How can Arya Jagat thank you ?
Anand