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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (13)

.....मन्त्र कहता है कि यदि स्थूल और सूक्ष्म शरीरों की उपेक्षा करके केवल कारण शरीर की उन्नति चाहते हो तो अन्धकार में पड़ना पड़ेगा, क्योंकि बिना स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के उन्नत हुए कारण शरीर की उन्नति प्राप्त नहीं हो सकती | और यदि कारण शरीर की उपेक्षा करके केवल कार्य शरीर = स्थूल + सूक्ष्म शरीरों को उन्नत करना चाहते हो, तो भी भविष्य अन्धकारमय होगा, क्योंकि इससे नास्तिकता उत्पन्न होगी, जैसे चार्वाक और यूरोप के प्रकृतिवादी नास्तिक विद्वान | इसीलिए तीसरे मन्त्र में, सिद्धान्त और कर्त्तव्य रूप से, यह शिक्षा दी गई है कि दोनों प्रकार के शरीरों की उन्नति साथ साथ होनीं चाहिये, तभी मृत्यु का बन्धन टूट सकता है | मृत्यु का बन्धन किस प्रकार छूट सकता है यही अन्तिम प्रश्न है, जो इन मन्त्रों के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है |

(अब गतांक से आगे)

इस प्रश्न का उत्तर सुगमता से समझ में आ जावे इसलिये इन शरीरों का एक कल्पित चित्र नीचे देते हैं :-
[नोट् : यह चित्र यहां नहीं दिया जा रहा है]

इन्हीं तीन शरीरों का विभाग एक और प्रकार से किया गया है जिसे कोश कहते हैं | उनका विवरण इस प्रकार है :-

(1) स्थूल शरीर - अन्नमय कोश |
(2) सूक्ष्म शरीर - 1. प्राणमय , 2. मनोमय, 3. विज्ञानमय कोश |
(3) कारण शरीर - आनन्दमय कोश

योग..........तीन शरीर, 5 कोश

इन शरीरों के दो सम्बन्ध हैं

(1) अवस्थाओं के द्वारा सम्बन्ध |

(2) प्राण के द्वारा सम्बन्ध |

पहले सम्बन्ध पर विचार -

पहला सम्बन्ध जाग्र्त आदि तीन अवस्थाओं द्वारा होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है :-

(1) जाग्रत अवस्था - इस अवस्था में तीनों शरीरों का सम्बन्ध बना रहता है |

(2) स्वप्नावस्था - इसमें सूक्ष्म और स्थूल शरीर का सम्बन्ध टूट जाता है, परन्तु सूक्ष्म और कारण शरीर का सम्बन्ध बना रहता है | इसका परिणाम यह होता है कि इन्द्रियों का व्यापार बन्द हो जाता है, परन्तु मन का कार्य जारी रहता है, इसलिए मनुष्य इस अवस्था में स्वप्न देखा करता है |

(3) सुषुप्तावस्था - इस अवस्था में सूक्ष्म और कारण शरीरों का का सम्बन्ध भी टूट जाता है और तीनों शरीरों में से किन्हीं दो का सम्बन्ध बाकी नहीं रहता |

इन अवस्थाओं और इनके सम्बन्ध के रहने, न रहने पर विचार करने से एक परिणाम निकलता है, जिसपर प्रत्येक विचारक को पहुँचना पड़ता है, और वह परिणाम यह है कि शरीरों के इन सम्बन्धों के टूटने से मनुष्य को सुख और शान्ति प्राप्त हुआ करती है | जिस समय मनुष्य जाग्रत अवस्था के कामों से थककर सो जाता है तो स्थूल शरीर का व्यवहार बन्द हो जाने से, उसे कुछ आराम मिलता है, तब मनुष्य स्वप्नावस्था से निकलकर सुषुप्तावस्था में पहुँच जाता है और इस अवस्था में, स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों का काम बन्द हो जाने से उसे पूर्ण शान्ति प्राप्त हो जाया करती है | इससे यह बात भली-भाँति समझ में आ जाती है कि जब एक (जाग्रत स्वप्नावस्था का) सम्बन्ध टूटा था तो कुछ आराम मिला था, परन्तु जब दोनों सम्बन्ध (तीनों शरीरों के) टूट गये तो मनुष्य को पूरा सुख और आराम मिला | इसलिए विद्वान सुषुप्तावस्था को मुक्तावस्था का आंशिक उद्धाहरण रूप समझा करते हैं | निष्कर्ष यह निकला कि शरीरों के सम्बन्ध टूटने से सुख प्राप्त हुआ करता है |

दूसरे सम्बन्ध पर विचार -

इस परिणाम पर पहुँचने के बाद अब दूसरे सम्बन्ध पर विचार कीजिए | दूसरा सम्बन्ध स्थूल और सूक्ष्म शरीर का एकमात्र प्राण के द्वारा है, जिस सम्बन्ध के बने रहने का नाम जीवन और टूटने का नाम मृत्यु है | पहले सम्बन्ध पर विचार करते हुए हमने देख लिया है कि सम्बन्धों के टूटने से हमें सुख प्राप्त होता है | उसी परिणाम को लक्ष्य और उद्धाहरण में रखते हुए दूसरे सम्बन्ध पर विचार करें, तो सुगमता से यह बात समझ में आ जायेगी कि यदि वह दूसरा सम्बन्ध भी टूट जाय, तो उसका परिणाम भी यही निकलेगा कि मनुष्य को सुख मिले | इस कल्पना के लिए कि इस दूसरे सम्बन्ध के टूटने से मनुष्य को दुख होगा, संसार में कोई उद्धाहरण ही नहीं है | इसलिए दूसरे सम्बन्ध का टूटना रूप मृत्यु दुखप्रद नहीं अपितु सुखप्रद है | यही उच्च शिक्षा है, जो उपनिषद् दुनियाँ को देना चाहती है | इस परिणाम पर मनुष्य तभी पहुँच सकता है, जब वह इन तीनों मन्त्रों में वर्णित कारण और कार्य तीनों प्रकार के शरीरों को अपने पुरुषार्थ का क्षेत्र समझ कर पहले कर्त्तव्य का पालन करते हुए उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे उस प्राप्त ज्ञान को कार्य में परिणित करे | उस यथार्थता की प्राप्ति के लिए प्राणायाम मुख्य साधन है | उससे कार्य शरीरों का पूरा पूरा विकास हुआ करता है | इसलिए उनका कुछ विवरण यहां दिया जाता है |
[फुट-नोट - प्राणायाम का विवरण यहाँ उद्धाहरण के तौर पर दिया गया है, जिससे समझ लिया जावे कि किस प्रकार शरीरों का ज्ञान प्राप्त करके उसे कार्य में परिणित करना चाहिए |]

प्राणायाम से शारीरिक उन्नति किस प्रकार होती है, इस बात के जानने के लिए एक दृष्टि, शरीर के अन्दर होने वाले अनिच्छित कार्यों में से, हृदय और फेफड़ों के कार्यों पर डालनी होगौ |

क्रमशः