Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (14)

.....उस यथार्थता की प्राप्ति के लिए प्राणायाम मुख्य साधन है | उससे कार्य शरीरों का पूरा पूरा विकास हुआ करता है | इसलिए उनका कुछ विवरण यहां दिया जाता है |
प्राणायाम से शारीरिक उन्नति किस प्रकार होती है, इस बात के जानने के लिए एक दृष्टि, शरीर के अन्दर होने वाले अनिच्छित कार्यों में से, हृदय और फेफड़ों के कार्यों पर डालनी होगौ |

(अब गतांक से आगे)

हृदय का स्थूल कार्य -

इन शरीरों में दो प्रकार की अति सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं | एक तो वे जो समस्त शरीर में हृदय में आती हैं और दूसरी नाड़ियाँ वे हैं जो हृदय से समस्त शरीर में जाया करती हैं | पहली नाड़ियाँ शिराएँ और दूसरी धमनियाँ कहलाती हैं | शिराओं का काम यह है कि समस्त शरीर‌ में से अशुद्ध रक्त शुद्ध होने के लिए हृदय में लाया करें | हृदय उस रक्त को शुद्ध करता है | रक्त अशुद्ध क्यों होता है ? इसका हेतु यह है कि समस्त शरीर के व्यापारों में उसका प्रयोग होता है और प्रयोग में आने से अशुद्ध हो जाता है |उसमें कुछ मैलापन आ जाता है | शुद्ध रक्त में ओषजन (Oxygen) काफी मात्रा में रहता है परन्तु काम में आने से जब वह अशुद्ध‌ हो जाता है, तब उसमें ओषजन की मात्रा नाममात्र रह जाती है और उसकी जगह् एक विषैली वायु (Carbonic Acid Gas) रक्त में आ जाती है, और इसी परिवर्तन में रक्त का रंग मैला स्याही-माइल सा हो जाता है |

फेफड़े का काम -

हृदय में जब अशुद्ध रक्त शिराओं द्वारा पहुँचता है, तो हृदय उसे फेफड़ों में भेजता है | यहीं से फेफड़ों का काम आरम्भ होता है | फेफड़ा स्पञ्ज की भांति असंख्य छोटे छोटे कोशों (Cells) का समुदाय है | वैज्ञानिकोंने हिसाब लगाया है कि एक शरीर में यदि लम्बाई, चौड़ाई में फेफड़ों के कोषों को फैला दिया जाय, तो उनका विस्तार चौदह सहस्त्र वर्ग‌फुट होगा | वे कोश एक मांसपेशी (डायाफ्राम‌) की चाल से खुलते और बन्द होते रहते हैं | जब वे कोश खुलते हैं तब एक और तो हृदय से अशुद्ध रक्त और दूसरी और से श्वास के द्वारा लिया हुआ शुद्ध वायु दोनों मिलकर उसे भर देते हैं | अब इन कोशों में इस प्रकार से अशुद्ध रक्त और शुद्ध वायु दोनों एकत्र हो गये हैं | प्रकृति का का एक विलक्षण नियम यह है कि जिसमें जो वस्तु नहीं होती वह उसी को दूसरे से अपनी और खींच‌ती है | रक्त में तो शुद्ध वायु ओषजन नहीं है और श्वास के द्वारा लिए वायु में कार्बन वायु नहीं है | इन दोनों में जब उपर्युक्त नियम काम करता है तब उसका परिणाम यह होता है कि रक्त में से कार्बन वायु निकल कर श्वास के वायु में और श्वास के द्वारा आये हुए वायु में से ओषजन निकलकर रक्त में चला जाता है | फल यह होता है कि रक्त इस प्रकार शुद्ध और श्वास के द्वारा आया वायु अशुद्ध हो जाता है | शुद्ध रक्त हृदय में जाकर धमनियों के द्वारा समस्त शरीर में चला जाता है, और अशुद्ध वायु निःश्वास द्वारा बाहर निकल आता है | यह कार्य प्रतिक्षण हुआ करता है |

हृदय की धड़कन -‍‍

हृदयकी धड़कन क्या वस्तु है ? एक बार हृदय से रक्त शुद्ध होने के लिये फेफड़े में जाना और फेफड़े से से शुद्ध होकर रक्त का हृदय में वापिस आना, बस इन्हीं दोनों क्रियाओं से, हृदय में धड़कन बनती है | औसतन एक मिनट में 72 धड़कनें एक प्रौढ़‌ पुरुष के हृदय में हुआ करती हैं | विशेष अवस्थाओं में आयु के अन्तर से धड़कन की मात्रा न्यूनाधिक हुआ करती हैं | आमतौर से एक सेकिण्ड से कम समय में एक बार रक्त शुद्ध होने के लिये फेफड़े में आता और शुद्ध होकर वापिस चला जाता है | एक शरीर वैज्ञानिक नें हिसाब लगाया है कि इस प्रकार 24 घण्टे में 252 मन रक्त हृदय से फेफड़े में आता है, और इतना ही रक्त शुद्ध होकर फेफड़े से हृदय में वापिस चला जाता है | इस धड़कन से आवाज, 'लूव' 'डप' के उच्चारण जैसी होती है | जब हृदय संकुचित होकर रक्त निकालता है तब 'लूव' के सदृश ध्वनि होती है और फैलकर जब रक्त ग्रहण करता है तब 'डप शब्द की ध्वनि होती है | इन दोनों ध्वनियों में समय का कुछ अन्तर अवष्य होता है, परन्तु इतना थोड़ा कि दोनों शब्द मिले हुए से मालुम होते हैं, और विशेषज्ञों के सिवाय साधारण लोग इस अन्तर को नहीं ख्याल कर सकते | अस्तु, अब विचारणीय बात यह है कि हृदय से रक्त शुद्ध होने के लिये फेफड़ों में तो जावे परन्तु श्वास के द्वारा पर्याप्त वायु फेफड़ों में न पहुँचे अथवा सब कोशों में जहाँ रक्त पहुँच चुका हो, शुद्ध वायु न पहुँचे तो उसका परिणाम क्या होगा ? फेफड़े के मुख्यतया तीन भाग हैं - ‍एक ऊपरी भाग जो प्रायः गर्दन तक है, (2) मध्यम भाग जो इधर उधर हृदय के दोनों और है, (3) निम्न भाग जो डायफ्राम (मांसपेशी) के ऊपर दोनों और है | साधारण रीति से जो श्वास लिया जाता है वह पूर्ण श्वास नहीं होता, इसलिए फेफड़े के सब भागों अथवा सब भागों के समस्त कोशों में नहीं पहुँचता | जब फेफड़े के ऊपरी भागों में श्वास द्वारा वायु नहीं पहुँचता तो फेफड़ों का ऊपरी भाग रोगी होना शुरू होता है और उसके इस प्रकार रोगी हो जाने से एक रोग हो जाता है जिसे 'ट्यूबरक्यूलोसिस ' (Tuberculosis) कहते हैं और जब इसी प्रकार फेफड़ों के मध्य और निम्न भाग बेकार और त्रुटिपूर्ण होने लगते हैं तो उसके परिणाम में खाँसी, दमा, निमोंनिया, जीर्णज्वरादि अनेक रोग जो फेफड़ों से सम्ब‌न्धित होते हैं , होने लगते हैं | इस प्रकार पर्याप्त वायु फेफड़े में न पहुँचने से जहां एक और फेफड़े से सम्बद्ध रोग उत्पन्न होते हैं तो दूसरी और उसका एक परिणाम यह भी होता है कि हृदय से जो रक्त शुद्ध होने के लिये फेफड़े में आता है वह बिना शुद्ध हुए अशुद्ध हृदय में वापिस चला जाता है | हृदय भी उसे रोक नहीं सकता | वहां से वह धमनियों के द्वारा समस्त शरीर में पहुँचता है | इसका फल रक्त विकार होता है | रक्त के विकृत होने से मामूली रोग खाज (खुजली, खारिश‌) से लेकर् भयंकर रोग कुष्ट तक हो जाता है |इसलिए इन सब दुष्ट परिणामों से बचने के लिए आवश्यक है कि फेफड़े वायु से पूरित होते रहें और कोई कण (कोश‌) उसमें ऐसा न रहने पावे जहाँ वायु न पहुँच सके | यहीं से प्राणायाम की जरूरत शुरु होती है |

प्राणायाम की आवश्यक्ता -

प्राणायाम के द्वारा जब यह श्वास बाहर रोक दिया जाता है तब मनुष्य के भीतर श्वास लेने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हो जाती है | उसका फल यह होता है कि श्वास भीतर लेते समय श्वास वेग के साथ तेज हवा व आँधी के सदृश होकर फेफड़े में पहुँचता है और जिस प्रकार आँधी व तेज हवा नगर के कोने कोने में प्रवेश करती है, इसी प्रकार वेग के साथ श्वास के द्वारा भीतर लिया हुआ वायु फेफड़े के एक एक कोश तक पहुँचता जाता है | उससे न तो फेफड़े में ही कोई विकार होने पाता है और न रक्त ही दूषित होने पाता है | अस्तु देख लिया गया कि प्राणायाम शरीर की उन्नति का हेतु ही नहीं, अपितु मुख्य हेतु है | इसलिए स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक नर-नारी के लिए आवश्यक है कि प्राणायाम किया करे | यह शारीरिक उन्नति का विवरण हुआ | इसी प्रकार इससे मानसिक उन्नति भी होती है | निदान दोनों प्रकार के कर्त्तव्य प्राणायाम से विशेष सम्बन्ध रखते हैं |

क्रमशः