महर्षि दयानन्द‌ - पूर्ण विवेकी राज हंस‌

महर्षि दयानन्द‌ - पूर्ण विवेकी राज हंस

राजहंस पक्षी का यह गुण प्रसिद्ध है कि उसके सामने यदि दूध और पानी मिलाकर रखा जावे, तो वह दूध पी लेता हे, और पानी छोड़ देता है, अथवा दूध और पानी मिले हुए में से दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है | और इसी गुण को यदि मनुष्य धारण कर ले तो उसे विवेक गुण कहा जाता है | सो महर्षि राजहंस की भान्ति पूर्ण विवेकी थे | वैदिक साहित्य में हिंसा और अहिंसा का दूध और पानी की तरहं मिलाप हो रहा है | और उस अहिंसा और हिंसा के मिलाप को कोई पूर्ण विवेकी ही पृथक पृथक कर सकता है | महर्षि से पहले आने वाले बहुत से आचार्यों अर्थात बुद्ध और जैन आचार्य तो अहिंसा परमोधर्मा का नारा लगाकर अहिंसा और हिंसा में कोई विवेक न कर सके और फिर शंकराचार्य जैसे महापुरुष भी, कीड़ी तक को भी मारने का परहेज बताकर उसी डगर पर चलते रहे और अहिंसा तथा हिंसा के विवेक न होने के कारण हमारा यह देश एक हजार वर्ष तक विदेशियों की परतन्त्रता की जंजीरों में जकड़ा रहा और अब हजारों वर्षों के बाद महर्षि दयानन्द ही ऐसा पूर्ण‌ पुरुष हुआ है जिसने राजहंस की भान्ति अहिंसा और हिंसा का पूर्ण विवेक करके इन दोनों के वास्तविक स्वरूप को भारत में प्रचारित कर इस मुर्दा जाति के अन्दर जीवन का संचार किया, और हजारों वर्षों से लुप्त प्राय क्षात्र धर्म को उजागर करके इस देश को आजाद करने का प्रोग्राम बनाकर देश की स्वतन्त्रता के स्वप्न को पूरा कर दिया |

वेदों में बहुत से मन्त्र ऐसे हैं, जो सकल संसार के साथ मित्रता का उपदेश करते हैं | जैसे "मित्रस्य् चक्षुषा समिक्षामहे या सर्वाआशा मम मित्रं भवन्तु " परन्तु वेद में ऐसे मन्त्र भी बहुत है, जहां शत्रुओं को, दुष्टों को, आतताइओं को, मार डालने की भी स्पष्ट आज्ञा पाई जाती है | इस प्रकार मनुस्मृति आदि धर्म ग्रन्थों में दोनों ही किसम के श्लोक लिखे मिलते हैं, ऐसी सूरत में अहिंसा और हिंसा का जो मिश्रण वैदिक साहित्य में पाया जाता है, इसमें से किस समय अहिंसा धर्म है, और किस समय हिंसा धर्म है इसका विवेक हजारों वर्षों के बाद महर्षि द्यानन्द जी महाराज ने किया - अतः सत्यार्थ प्रकाश के दशम समुल्लास में स्पष्ट लिखा है " कि जो हानिकारक पशु अथवा मनुष्य हों | राजा उनको दण्ड देवे | और प्राण से भी विमुक्त‌ कर दे |" सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में मनुस्मृति के श्लोक लिखकर स्वामी जी लिखते हैं, " चाहे गुरु पुत्रादि बालक हों, चाहे पिता आदि वृद्ध, चाहे ब्राह्मण, चाहे बहुत शास्त्रों का श्रोता क्यों न हो, जो धर्म को छोड़कर अधर्म में वर्त्तमान होकर दूसरे को बिना अपराध मारने वाले हों, उनको बिना विचारे मार डालना चाहिए, दुष्ट पुरुषों को मारने में हन्तः को कोई पाप नहीं होता | इस प्रकार वेद और शास्त्रों का मन्थन कर महर्षि जी ने अहिंसा और हिंसा का पूर्ण विवेक कर दिया और आर्यसमाज का सातवां नियम बना कर के " सब के साथ प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए " समुद्र को कूजे में बन्द करके अपने को राजहंस यानि पूर्ण विवेकी सिद्ध कर गये |

श्री कुन्दन लाल आर्य चूनियांवाले कृत
'पूर्णपुरुष का विचित्र जीवन चरित्र' से साभार उदृत‌

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