ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत - (प्रथम लेख)
मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती संक्षेप से अपना जन्म चरित्र लिखता हूँ ||
संवत 1881 के वर्ष में मेरा जन्म दक्षिण गुजरात प्रान्त देश काठियावाड़ का मजोकठा देश मोर्वी का राज्य [में] औदीच्य ब्राह्मण के घर में हुआ था, यहां अपना पिता का और निज निवास स्थान के प्रसिद्ध नाम इसलिये मैं नहीं लिखता कि जो माता पिता आदि जीते हों मेरे पास आवें तो इस सुधार के कार्य में विघ्न हो क्योंकि मुझको उनकी सेवा करना उनके साथ घूमने में श्रम और धन आदि का व्यय कराना नहीं चाहता | मैंने पांचवे वर्ष में देवनागरी अक्षर पढ़ने का आरम्भ किया था | और मुझको कुल की रीति की शिक्षा भी माता पिता आदि किया करते थे, बहुत से ध्रर्मशास्त्रादि के श्लोक और सूत्रादिक कण्ठस्थ कराया करते थे | फिर आठवें वर्ष में मेरा यज्ञोपवीत कराके गायत्री संध्या और उसकी क्रिया भी सिखा दी गयी थी | और मुझको यजुर्वेद की संहिता का आरम्भ कराके उसमें से प्रथम रुद्राध्याय पढ़ाया गया था, और मेरे कुल में शैव मत था उसी की शिक्षा भी किया करते थे | और पिता आदि लोग यह भी कहा करते थे कि पार्थिवपूजन अर्थात मट्टी का लिङ्ग बना के तूँ पूजा कर | और माता मने किया करती थी कि यह प्रातःकाल भोजन कर लेता है इससे पूजा नहीं हो सकेगी पिताजी हठ किया करते थे कि पूजा अवश्य करनी चाहिये क्योंकि कुल की रीति है | तथा कुछ कुछ व्याकरण का विषय और वेदों का पाठमात्र भी मुझको पढ़ाया करते थे | पिताजी अपने साथ मुझको जहां तहां मंदिर और मेल मिलापों में ले जाया करते और यह भी कहा करते थे कि शिव की उपासना सबसे श्रेष्ठ है | इस प्रकार 14 वर्ष की अवस्था के आरम्भ तक यजुर्वेद की संपूर्ण और कुछ अन्य वेदों का भी पाठ पूर्ण हो गया था | और शब्दरूपावली आदि व्याकरण के ग्रन्थ भी पूरे हो गये थे | पिता जी जहाँ जहाँ शिवपुराण की कथा होती थी, वहां वहां मुझको बैठकर सुनाया करते थे | और घर में भिक्षा की जीविका नहीं थी किन्तु जमींदारी और लेनदेन से जीविका के प्रबन्ध करके सब काम चलाते थे | और मेरे पिता ने माता के मने करने पर भी पार्थिव पूजन का आरम्भ करा दिया था | जब शिवरात्रि आई तब 13 त्रयोदशी के दिन कथा का महात्म्य सुना के शिवरात्रि के व्रत करने का निश्चय करा दिया | परन्तु माता ने मने भी किया कि इससे व्रत नहीं रहा जयगा, तथापि पिताजी ने व्रत का आरम्भ करा दिया |और जब 14 चतुर्दशी को शाम हुई तब बड़े बड़े बस्ती के रईस अपने पुत्रों के सहित मन्दिर में जागरण करने को गये वहां मैं भी अपने पिता के साथ गया और प्रथम प्रहर की पूजा भी करी दूसरे प्रहर की पूजा करके पुजारि लोग बाहर निकल के सो गये | मैंने प्रथम से सुन रखा था कि सोने से शिवरात्रि का फल नहीं होता है | इसलिये अपनी आंखों में जल के छींटे मार के जागता रहा और पिता भी सो गये तब मुझको शंका हुई कि जिसकी मैंने कथा सुनी थी वही यह महादेव है वा अन्य कोई क्योंकि वह तो मनुष्य के माफिक एक देवता है | वह बैल पर चढ़ता, चलता फिरता, खाता पीता, त्रिशूल हाथ में रखता डमरु बजाता, वर और शाप देता और कैलाश का मालिक है इत्यादि प्रकार का महादेव कथा में सुना था, तब पिता जी को जगा के मैने पूछा कि यह कथा का महादेव है या कोई दूसरा तब पिता ने कहा कि क्यों पूछता है | तब मैंने कहा कि कथा का महादेव तो चेतन है वह अपने ऊपर चूहों को क्यों चढ़ने देगा और इसके ऊपर तो चूहे फिरते हैं तब पिताजी ने कहा कि कैलाश पर जो महादेव रहते हैं उनकी मूर्ति बना और आवाहन करके पूजा किया करते हैं अब इस कलियुग में शिव का साक्षात दर्शन नहीं होता | इसलिये पाषाणादि की मूर्ति बना के उन महादेव की भावना रख कर पूजन करने से कैलाश का महादेव प्रसन्न हो जाता है | ऐसा सुन के मेरे मन में भ्रम हो गया कि इनमें कुछ गड़्बड़ अवश्य है | और भूख भी बहुत लग रही थी पिता से पूछा कि मैं घर को जाता हूँ | तब उन्होंने कहा कि सिपाही को साथ लेके चला जा परन्तु भोजन कदाचित मत करना मैने घर में जाकर माता से कहा कि मुझको भूख लगी है | माता ने कुछ मिठाई आदि दिया उसको खाकर 1 एक बजे पर सो गया |पिताजी प्रातः काल रात्रि के भोजन को सुनके बहुत गुस्से हुये कि तैने बहुत बुरा काम किया | तब मैने पिता से कहा कि यह कथा का महादेव नहीं है इसकी पूजा मैं क्यों करूँ | मन में तो श्रद्धा नहीं रही परन्तु ऊपर के मन पिताजी से कहा कि मुझको पढ़ने से अवकाश नहीं मिलता कि मैं पूजा कर सकूं | तथा माता और चाचा आदि ने भी पिता को समझाया इस कारण पिता भी शान्त हो गये कि अच्छी बात है पढ़ने दो | फिर निघण्टू, निरुक्त और पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों के पढ़ने की इच्छा करके आरम्भ करके पढ़ता रहा और कर्मकाण्ड विषय भी पढ़ता रहा | मुझसे छोटी 1 एक बहन फिर उससे छोटा एक भाई फिर भी एक बहन और एक भाई अर्थात दो बहन और दो भाई और हुए थे तब तक मेरी 16 वर्ष की अवस्था हुई थी | पीछे मुझसे छोटी 14 वर्ष की जो बहन थी उनको हैजा हुआ एक रात्रि में कि जिस समय नाच हो रहा था| नौकर ने खबर दी कि उसको हैजा हुआ है | तब सब जने वहां से तत्काल आये और वैद्य आदि बुलाये औषधि भी की तथापि चार घण्टे में उस बहन का शरीर छूट गया सब रोने लगे | परन्तु मेरे हृदय में ऐसा धक्का लगा और भय हुआ कि ऐसे ही मैं मर जाउंगा शोच विचार में पढ़ गया | जितने जीव संसार में हैं उनमें से एक भी न बचेगा | इससे कुछ ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे यह दुःख छूटे और मुक्ति हो अर्थात इसी समय से मेरे चित्त में वैराग्य की जड़ पड़ गई | परन्तु यह विचार अपने मन में ही रक्खा किसी से कुछ भी न कहा | इतने में 19 वर्ष की जब अवस्था हुई तब जो मुझसे अति प्रेम करने वाले बड़े धर्मात्मा विद्वान मेरे चाचा थे उनकी मृत्यु होने से अत्यन्त वैराग्य हुआ कि संसार में कुछ भी नहीं परन्तु यह बात माता पिता से तो नहीं कही किन्तु अपने मित्रों से कहा कि मेरा मन गृहाश्रम करना नहीं चाहता | उन्होंने माता पिता से कहा माता पिता ने विचारा कि इसका विवाह शीघ्र कर देना चाहिये | जब मुझको मालुम पढ़ा कि ये 20 बीसवें वर्ष में ही विवाह कर देंगें तब मित्रों से कहा कि मेरे माता पिता को समझा दो अभी विवाह न करें | तब उन्होंने एक वर्ष जैसे तैसे विवाह रोका तब 20 बीसवां वर्ष पूरा हो गया | तब मैंनें पिताजी से कहा कि मुझे काशीं में भेज दीजिये कि मैं व्याकरण ज्योतिष और वैद्यक आदि (के) ग्रन्थ पढ़ पाऊँ | तब माता पिता और कुटुम्ब के लोगों ने कहा कि हम काशीं को कभी न भेजेंगे जो पढ़ना हो सो यहीं पढ़ो | और अगले साल में तेरा विवाह भी होगा | क्योंकि लड़की वाला नहीं मानता | और हमको अधिक पढ़ा के क्या करना है जितना पढ़ा है वही बहुत है | फिर मैंने पिता आदि से कहा कि मैं पढ़ कर आऊँ तब विवाह होना ठीक है तब माता भी विपरीत हो गई कि हम कहीं नहीं भेजते और अभी विवाह करेंगे | तब मैंने चाहा कि अब सामने रहना अच्छा नहीं | फिर तीन कोश ग्राम में अपनी जिमींदारी थी वहां एक अच्छा पण्डित था माता पिता की आज्ञा लेकर वहां जाकर उस पण्डित के पास मैं पड़ने लगा | और वहां के लोगों से भी कहा कि मैं गृहाश्रम करना नहीं चाहता | फिर माता पिता ने मुझे बुला के विवाह की तैयारी कर दी तब तक 21 इक्कीसवां वर्ष भी पूरा हो गया | तब मैंने निश्चित जाना कि अब विवाह किये बिना कदाचित् न छोड़ेंगे | फिर चुपचाप संवत 1903 के वर्ष घर छोड़ के सन्ध्या के समय भाग उठा चार कोश पर एक ग्राम था वहां जाकर रात्रि को ठहर कर दूसरे दिन प्रहर रात्रि से उठ के 15 कोश चला परन्तु प्रसिद्ध ग्राम सड़क और जानकारों के ग्रामों को छोड़ के बीच बीच में नित्य चलने का प्रारम्भ किया | तीसरे दिन मैंने किसी राजपुरुष से सुना कि फलाने का लड़का घर छोड़ कर चला गया उसको खोजने के लिये सवार और पैदल आदमीं यहां तक आये थे | जो मेरे पास से थोड़े से रुपये और अंगूठी आदि भुषण था वह सब पोपों ने ठग लिया | मुझसे कहा कि तुम पक्के वैराग्यवान तब होंगे कि जब अपने पास की चीज सब पुण्य कर दो फिर उन लोगों के कहने से मैंने जो कुछ था सब दे दिया | फिर लाला भगत की जगह जो कि सायले शहर में है वहां बहुत साधुओं को सुन कर चला गया वहां एक ब्रह्मचारी मिला उसने मुझसे कहा कि तुम नैष्टिक बृह्मचारी हो जाओ उसने मुझ्को ब्रह्मचारी की दीक्षा दी और शुद्ध चैतन्य मेरा नाम रक्खा तथा काषाय वस्त्र भी करा दिये | जब मैं वहां से अहमदाबाद के पास कोठगांगड़ जो कि छोटा सा राज्य है वहां आया तब मेरा ग्राम के पास वाला एक वैरागी मिला उसने पूछा कि तुम यहां कहां से आये और कहां जाना चाहते हो | तब उससे मैने कहा कि घर से आया और कुछ देशभ्रमण किया चाहता हूँ | उसने मुझसे कहा कि तुमने काषाय वस्त्र धारण करके क्या घर छोड़ दिया | मैंने कहा कि हां मैंने घर छोड़ दिया और कार्त्तिकि के मेले पर् सिद्धपुर को जाऊंगा | फिर मैं वहां से चल कर सिद्धपुर में आके नीलकण्ठ महादेव की जगह में ठहरा किजहां दण्डी स्वामी ब्रह्मचारी ठहर रहे थे | उनका सत्संग और जो जो कोई महात्मा वा पण्डित मेले में सुन पड़ा उन सबके पास गया और उनसे सत्संग किया | जो मुझको कोठगांगड़ में वैरागी मिला था उसने मेरे पिता के पास पत्र भेजा कि तुम्हारा पुत्र ब्रह्मचारी हुआ काषाय वस्त्र धारण किये मुझको मिला और कार्त्तिकी के मेले में सिद्धपुर को गया | ऐसा सुन के सिपाहियों के सहित पिताजी सिद्धपुर के मेले में खोज कर पता लगाके जहां पण्डितों के बीच मैं बैठा था वहां पहुँच कर मुझसे बोले कि तूं हमारे कुल में कलंक लगाने वाला पैदा हुआ | तब मैंने पिताजी की और देख के उठके चरणस्पर्श किया और नमस्कार करके बोला कि आप क्रोधित मत हूजिये मैं किसी आदमीं के बहकाने से चला आया और मैने बहुत सा दुख पाया | अब मैं घर को आने वाला था | परन्तु अब आप आये यह बहुत अच्छा हुआ कि अब मैं साथ साथ घर को चलूंगा | तो भी क्रोध के मारे मेरे गेरू के रंगे वस्त्र और एक तूंबे को तोड़ फार के फेंक दिये और वहां भी बहुत कठिन कठिन बातें कह कर बोले कि तूं अपनी माता की हत्या किया चाहता है | मैने कहा कि मैं अब घर को चलूंगा तो भी मेरे साथ सिपाही कर दिये कि क्षण भर भी इसको अकेला मत छोड़ो और इस पर रात्री को भी पहरा रक्खो | परन्तु मैं भागने का उपाय देख रहा था | सो जब तीसरी रात के तीन बजे के पीछे पहरे वाला बैठा बैठा सो गया उसी समय मैं लघुशंका का बहाना करके भागा | आध कोश पर एक मन्दिर के शिखर की गुफा में एकवृक्ष के सहारे से चढ़ और जल का लोटा भर के छिपकर बैठा रहा जब चार बजे का अमल हुआ तब मैंने उन्हीं सिपाहियों में से एक सिपाही मालियों से मुझको पूछता सुना तब मैं और भी छिप गया ऊपर बैठा सुनता रहा वे लोग ढूंढ कर चले गये मैं उसी मन्दिर के शिखर में दिन भर रहा | जब अन्धेरा हुआ तब उस पर से उतर सड़क को छोड़ के किसी को पूछ के दो कोश पर एक ग्राम था उसमें ठहर् के अहमदाबाद होता हुआ बड़ोदरे शहर में आकर ठहरा | वहां चेतन मठ में ब्रह्मानन्द आदि ब्रह्मचारी और सन्यासियों सेअ वेदान्त विषय की बहुत बातें की | और मैं ब्रह्म हूं अर्थात जीव ब्रह्म एक है ऐसा निश्चय उन ब्रह्मानन्दादि ने मुझको करा दिया | प्रथम वेदान्त पड़ते समय भी कुछ कुछ निश्चय हो गया था परन्तु वहां ठीक दृड़ हो गया कि मै ब्रह्म हूं | फिर वहीं बड़ोदे में एक बनारसीबाई वैरागी का स्थान सुनकर उसमें जाके एक सच्चिदानन्द प्रमहंस से भेंट करके अनेक प्रकार की शास्त्र विषयक बात हुई फिर वहां सुना कि आजकल चाणोदकन्याली में बड़े बड़े संन्यासी ब्रह्मचारी और विद्वान ब्राह्मण रहते हैं | वहां जाके दीक्षित और चिदाश्रमादि स्वामी ब्रह्मचारी और पण्डितों से अनेक विषयों पर परस्पर संभाषण हुआ | फिर एक परमानन्द परमहंस से वेदान्तसार आर्य्याहरिमीडे तोटक वेदान्तपरिभाषा आदि प्रकरणों का थोड़े महीनों में विचार कर लिया | उस समय ब्रह्मचर्यावस्था में कभी कभी अपने हाथ से रसोई बनाने पड़ती थी इस कारण पढ़ने में विघ्न विचार के चाहा कि अब संन्यास ले लेना अच्छा है | फिर एक दक्षिणी पण्डित के द्वारा वहां जो दीक्षित स्वामी विद्वान थे उनको कहलाया कि आप उस ब्रह्मचारी को संन्यास की दीक्षा दे दीजिये |क्योंकि मैं अपना ब्रह्मचारी का नाम भी बहुत प्रसिद्ध नहीं करना चाहता था क्योंकि घर का भय बड़ा था जोकि अब तक बना है | तब उन्होंने कहा कि उसकी अवस्था कम है इसलिये हम नहीं देते | इसके अनन्तर दो महीने के पीछे दक्षिण से एक दण्डी स्वामी और एक ब्रह्मचारी आके चणोद से कुछ कम कोश भर जो मकान जो जंगल में था उसमें ठहरे उनको सुनकर एक दक्षिणी वेदान्ती पण्डित और मैं दोनों उसके पास जाके शास्त्रविषयक संभाषण करने से मालुम हुआ कि अच्छे विद्वान हैं | और वे श्रृंगीरी मठ की और से आके द्वारिका की और जाते थे उनका नाम पूर्णानन्द सरस्वती था | उनसे उस वेदान्ति के द्वारा कहलाया कि ये ब्रह्मचारी विद्या पढ़ना चाह्ते हैं | यह मैं ठीक जानता हूं कि किसी प्रकार का अपगुण इनमें नहीं है इनको आप संन्यास दे दीजिये संन्यास लेने का इनका प्रयोजन यही है कि निविघ्न विद्या का अभ्यास कर सकें | तब उन्होंने कहा कि किसी गुजराती स्वामी से कहो क्योंकि हम तो म[हा]राष्टृ हैं | तब उनसे कहा कि दक्षीणी स्वामी गौड़ों को भी संन्यास देते हैं तो यह ब्रह्मचारी तो पंच द्रविड़ है इससे क्या चिन्ता है | तब उन्होंने मान लिया और उसी ठिकाने तीसरे दिन संन्यासी की दीक्षा दण्ड ग्रहण कराया और दयानन्द सरस्वती नाम रक्खा |परन्तु दण्ड का विसर्जन भी उसी स्वामी जी के साम्हने कर दिया क्योंकि दण्ड की भी बहुत सी क्रिया है कि जिससे पढ़्ने में विघ्न हो सकता था | फिर वे स्वामी जी द्वारिका की और चले गये | मैं कुछ दिन चाणोदकन्याली में रहके व्यासश्रम में एक योगानन्द स्वामी को सुना कि वे योगाभ्यास में अच्छे हैं उनके पास जाके योगाभ्यास की क्रिया सीख कैक कृष्ण शास्त्री छिलौर शहर के बाहर रहते थे उनको सुनके व्याकरण पढ़ने के लिये उनके पास गया और कुछ व्याकरण का अभ्यास करके फिर चाणोद में आकर ठहरा वहां दो योगी मिले जिनका नाम ज्वालानन्दपुरी और शिवानन्द गिरी था | उनसे भी योगाभ्यास की बातें हुईं और उन्होंने कहा कि तुम अहमदाबाद में आओ वहां हम नदी के ऊपर दूधेश्वर महादेव में ठहरेंगे | वहां आओगे तो योगाभ्यास की रीति सिखलायेंगे | वहां से वे अहमदाबाद को चलेअ गये फिर एक महीने के पीछे मैं भी अहमदाबाद में जाके उनसे मिला और योगाभ्यास की रीति सीखी | फिर आबूराज पर्वत में योगियों को सुन के वहां जाके अर्वदाभवानी आदि स्थानों में भवानी गिरि आदि योगियों से मिल के कुच्छ योगाभ्यास की रीति सीख के संवत1911 के वर्ष के अन्त में हरद्वार के कुम्भ के मेले में आके बहुत साधु संन्यासियों से मिला और जब तक मेला रहा तब तक चण्डी के पहाड़ के जंगल में योगाभ्यास करता रहा | जब मेला हो चुका तब हृषिकेश में जाके संन्यासियों और योगियों से योग की रीति सीखना और सत्संग करता रहा ||
इसके आगे फिर लिखेंगें |
दयानन्द सरस्वती
