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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत - (तृतीय लेख)( द्वितीय व अन्तिम‌ भाग)

...1913 वि. अगले पाँच मास में कानपुर व प्रयाग के मध्यवर्ती अनेक प्रसिद्ध स्थान मैंने देखे | भाद्रपद के प्रारम्भ में मिर्जापुर पहुँचा | वहाँ एक मास से अधिक विंध्याचल अशोलजी के मन्दिर में निवास किया | असूज के आरम्भ में काशी पहुँचा | वहाँ जाके मैं उस गुफा में ठहरा जो वरणा और गंगा के संगम पर है | और जो उस समय भवानन्द सरस्वती के अधिकार में थी | वहाँ पर कई शास्त्रियों अर्थात काकाराम, राजाराम आदि से मेरा परिचय हुआ परन्तु वहाँ केवल 12 दिन रहा |

अब गतांक से आगे :
तत्पश्चात जिस वस्तु की खोज में था उसके अर्थ आगे को चल दिया | और असूज सुदि 2 स्. 1913 को दुर्गाकुण्ड के मन्दिर पर जो चण्डालगढ़ में है, पहुँचा | वहाँ दस दिन व्यतीत किये | यहाँ मैंने चावल खाने सर्वदा छोड़ दिये और केवल दूध पर अपना निर्वाह करके दिन रात योग विद्या के अध्य्यन और अभ्यास में तत्पर रहा | दौर्भाग्यवश वहाँ मुझे एक बड़ा दोष लग गया, अर्थात भांग पीने का स्वभाव हो गया | सो कई बार उसके प्रभाव से मैं बेसुध हो जाया करता | एक दिन मंदिर से निकल कर चण्डालगढ़ के निकटस्थ जो एक ग्राम आता था तो एक पुराना साथी मिला | ग्राम के दूसरी ओर कुछ ही दूर शिवालय था | वहाँ जाकर मैंने रात काटी | रात्रि के समय भांग से उत्पन्न हुई मादकता के कारण जब मैं अचेत सोता था तो मैने एक स्वप्न देखा | वह ऐसे था | मुझे विचार हुआ कि मैंने महादेव और उसकी स्त्री पार्वती को देखा | वे परस्पर वार्त्तालाप कर रहे थे और उनकी बातों का पात्र मैं था , अर्थात मेरे ही सम्बन्ध में वे कह रहे थे | पार्वती महादेव जी से कहती थी " उत्तम हो यदि दयानन्द सरस्वती का विवाह हो जावे " परन्तु देवता इससे भेद प्रकट कर रहे थे और उनका संकेत भांग की ओर था | मैं जागा और स्वप्न पर विचार करने लगा | तब मुझे बड़ा दुख और क्लेश हुआ | उस समय धारासार वर्षा हो रही थी | मैंने उस बरामदे में जो मन्दिर के मुख्य द्वार के सन्मुख था विश्राम किया | वहाँ नन्दी वृष देवता की एक विशाल मूर्ति खड़ी थी | अपने वस्त्र और पुस्तकादि उसकी पृष्ठ पर रख कर मैं उसके पीछे बैठ गया और निज विचार में निमग्न हुआ | सहसा नन्दी मूर्ति के भीतर दृष्टिपात करने पर मुझे विदित हुआ कि एक मनुष्य उसमें छिपा हुआ है | मैंने अपना हाथ उसकी और फैलाया | इससे वह अति भयभीत हुआ, क्योंकि मैंने देखा कि उसने तत्काल छलांग मारी और छलांग मारते ही वेग से ग्राम की और भागा | तब उसके जाने पर मैं उस ही मूर्ति के भीतर बैठ गया और अवशिष्ठ रात्रि भर वहाँ सोता रहा | प्रातः काल एक वृद्धा वहाँ आई | उसने वृष देवता की पूजा की, जिस अवस्था में कि मैं भी उसके अन्दर ही बैठा हुआ था | कुछ देर पीछे वह गुड़‌ और दही लेकर लौटी | मेरी पूजा करके और भ्रान्ति से मुझे ही देवता समझकर उसने कहा, " आप इसे ग्रहण कीजिये और इसमें से कुछ खाइये |" मैंने क्षुधार्त्त‌ होने के कारण वह सब खा लिया | दही क्योंकि बहुत खट्टा था , अतः भांग की मादकता को दूर करने में एक अच्छा निदान हो गया | उससे मादकता जाती रही और मुझे बहुत आराम प्रतीत हुआ |

चैत्र 1914 वहाँ से आगे चला और वह मार्ग पकड़ा कि जिस और पर्वत थे और जहाँ से नर्मदा निकलती है, अर्थात नर्मदा के स्त्रोत की और यात्रा आरम्भ की | मैंने कभी एक बार भी किसी से मार्ग नहीं पूछा प्रत्युत दक्षिण ओर यात्रा करता हुआ चला गया | शीघ्र ही मैं एक ऐसे उजाड़, निर्जन स्थान में पहुँच गया जहाँ चारों ओर बहुत घने वन और जंगल थे | वहाँ जंगल में अनियमित दूरी पर बिना क्रम झाड़ियों के मध्य में कई स्थानों पर मलिन और उजाड़ झोपड़ियाँ थीं | कहीं कहीं पृथक पृथक ठीक झोपड़ियाँ भी दृष्टिगोचर होती थीं | उन झोपड़ियों में से एक पर मैंने किंचित् दुग्धपान किया और पुनः आगे की और चल दिया | परन्तु इसके आगे लगभग पौन कोस चलकर मैं पुनः एक ऐसे ही स्थान पर पहूँचा जहाँ कोई प्रसिद्ध मार्ग दिखाई न देता था | अब मेरे लिये यही उचित प्रतीत होता था कि उन छोटे छोटे मार्गों में से (जिन्हें मैं न जानता था कि कहाँ जाते हैं) कोई एक चुनूँ और उस ओर चल दूँ |सुतरां मैं शीघ्र ही एक निर्जन वन में प्रविष्ट हुआ | उस जंगल में बेरियों के बहुत वृक्ष थे | परन्तु घास इतना घना और लम्बा था कि मार्ग सर्वथा दृष्टिगोचर न होता था | वहाँ मेरा सामना एक बड़े काले रीछ से हुआ | वह पशु बड़े वेग और उच्च स्वर‌ से चीखा | चिंघाड़ कर अपनी पिछली टांगों पर खड़ा हो मुझे खाने के निमित्त उसने अपना मुख खोला | कुछ काल तक मैं निष्क्रिय स्तब्धवत् खड़ा रहा | पश्चात शनैः शनैः मैंने अपने सोटे को उसकी ओर उठाया | उससे भयभीत हो वह उलटे पाँव लौट गया | उसकी चिंघाड़ व गर्ज ऐसी बलपूर्ण थी कि ग्राम वाले जो मुझे अभी मिले थे, दूर से उसका शब्द सुनकर लठ ले शिकारी कुत्तों सहित मेरी रक्षार्थ वहाँ आये | उन्होंने मुझे यह समझाने का परिश्रम किया कि मैं उनके साथ चलूँ | वे बोले, "इस जंगल में यदि तुम कुछ भी आगे बढ़ोगे तो तुम्हें संकटों का सामना करना पड़ेगा | पर्वत या वन में बहुत से भयानक क्रूर और हिंसक जंगली पशु अर्थात रीछ, हाथी, शेर आदि तुमको मिलेंगे |" मैंने उनसे निवेदन किया कि आप मेंरे कुशल मंगल का कुछ भय न करें क्योंकि मैं कुशल मंगल और रक्षित हूँ | मेरे मन में तो यही सोच थी कि किसी प्रकार नर्मदा का स्त्रोत देखूँ | अतः समस्त भय और कष्ट मुझे अपने संकल्प से न रोक सकते थे | जब उन्होंने देखा कि उनकी भयानक बातें मेरे लिये कोई भय उत्पन्न नहीं करती और मैं अपने संकल्प में पक्का हूँ तो उन्होंने मुझे एक दण्ड दिया जो मेरे सोटे से बड़ा था और जिससे मैं अपनी रक्षा करूँ | मैंने उस दण्ड को तुरन्त अपने हाथ से फेंक दिया |

उस दिन जब तक कि संसार में चारों ओर अन्धकार न छाया मैं बराबर यात्रा करता हुआ चला गया | कई घण्टों तक मानव बस्ती का मुझे कोई चिह्न न मिला | दूर दूर तक कोई ग्राम दिखाई न दिया | कोई झोंपड़ी भी तो दृष्टिगोचर न होती थी और न ही कोई मनुष्य जाति मेरी आँखों के सामने आई | पर वह वस्तुएँ जो प्रायः मेरे मार्ग मे आईं, वृक्ष थे | उनमें से अनेक टूटे पड़े थे कि जिनकी जड़ों को मस्त हाथियों ने तोड़ और उखेड़ कर फेंक दिया था | इससे कुछ दूर आगे एक विशाल विकट वन दिखाई दिया | उसमें प्रवेश करना कठिन था अर्थात बेर आदि कांटे वाले वृक्ष इतने घने लगे हुए थे कि उनके भीतर से निकल कर वन में पहुँचना अति दुस्तर प्रत्युत असम्भव प्रतीत होता था | प्रथम तो मुझे उसके भीतर से निकलना असम्भव दिखाई दिया परन्तु पीछे पेट के बल और जानू के सहारे मैं शनैः शनैः सर्पवत् उन वृक्षों से निकला और इस प्रकार इस यात्रा और कठिनाई पर विजय प्राप्त की | इस दिग्विजय के प्राप्त करने में मुझको अपने शरीर के मांस को भी भेंट करना पड़ा | मैं इसमें से घायल और अधमरा होकर निकला | उस समय सर्वत्र अन्धकार छाया हुआ था | तम के अतिरिक्त कुछ दृष्टिगोचर न होता था | यद्यपि मार्ग रुका हुआ था और दिखाई न देता था तो भी मैं आगे बढ़ने के विचार को रोक न सकता था | मैं इस आशा में था कि कोई मार्ग निकल ही आवेगा | अतएव निरन्तर आगे को चलता गया और बढ़ता रहा | अन्त को मैं एक ऐसे भयानक स्थान में पहुँचा कि जहाँ चारों और उच्च शैल और पर्वत थे कि जिन पर घनीं औषधियाँ और वमस्पतियाँ उगी हुई थीं | परन्तु इतना अवश्य था कि मनुष्यवास के वहां कुछ कुछ चिह्न और संकेत पाये जाते थे | अस्तु | शीघ्र ही मुझे कई झोंपड़ियां और कुटियायें दिखाई पड़ीं | उनके चारों और गोबर के ढेर लगे हुये थे | निकट ही स्वच्छ जल की एक छोटी सी नदी थी | उसके तीर पर बहुत सी बक‌रियां चर रहीं थीं | झोपड़ियों और टूटे फूटे घरों के द्वारों और छिद्रों में से टिम‌टिमाता हुआ प्रकाश दिखाई देता था जो जाते हुये पथिक को स्वागत और बधाई के शब्द सुनाता हुआ प्रतीत होता था | मैंने वहां एक विशाल वृक्ष के नीचे जो एक झोंपड़ी के ऊपर फैला हुआ था रात्रि व्यतीत की | प्रातः उठ कर अपने क्षत पांव, हाथ, और दण्ड को नदी जल से धोकर संध्या वा प्रार्थना के लिये बैठने को ही था कि किसी जंगली पशु की गर्ज मेरे कर्ण गोचर हुई | वह ध्वनि 'टमटम ' का उच्च स्वर था | कुछ काल पश्चात मैंने एक बड़ी सवारी या जन समूह को आते हुये देखा | उसमें बहुत से स्त्री पुरुष और बालक थे | उनके पीछे बहुत सी गौएं और बकरियां थीं | वे एक झोंपड़ी या घर से निकले | अनुमान है कि वे किसी धार्मिक त्यौहार की रस्में पूरी करने के लिए जो रात्रि को हुआ, आये थे | जब उन्होंने मेरी ओर देखा और मुझे उस स्थान में एक अजान पुरुष जाना तो बहुत से मेरे चारों ओर एकत्र हुये | अन्ततः एक वृद्ध पुरुष ने आगे बढ़क‌र मुझसे पूछा तुम कहां से आये हो ? मैंने उन सबसे कहा कि मैं काशी से आया हूँ और अब नर्मदा नदी के स्त्रोत की और यात्रा के लिये जा रहा हूं | इतना पूछ कर वे सब मुझे अपनी उपासना करने में निमग्न छोड़ कर चले गये | उनके जाने के आधा घण्टा पश्चात उनका एक अध्यक्ष दो पर्वतीय पुरुषों सहित मेरे पास आया और एक दिशा में बैठ गया | वह वस्तुत: उन सबकी ओर से प्रतिनिधि बन कर मुझे अपनी झोंपड़ियों में बुलाने को आया था परन्तु पूर्ववत् मैंने अब भी उनका निमन्त्रण अस्वीकार किया क्योंकि वे सब मूर्तिपूजक थे | तब उसने अपने साथ वालों को मेरे समीप अग्नि प्रज्वलित करने का आदेश किया | और दो पुरुषों को स्थापित किया कि रात्रि भर मेरी रक्षा करते हुये जागते रहें | जब उसने मुझसे मेरे भोजन के सम्बन्ध में पूछा और मैंने उसे बताया कि मैं केवल दूध पीकर निर्वाह करता हूं तो उस दयावान अध्यक्ष व नेता ने मुझसे मेरा तूंबा मांगा | उसे लेकर वह अपनी कुटी को गया और वहां से उसे दूध से भरकर मेरे पास भेज दिया | मैंने उस रात्रि उसमें से थोड़ा सा दूध पिया | वह फिर मुझे उन पहरा देने वालों के ध्यान में छोड़ कर लौट गया | उस रात्रि मैं घौर निद्रा में सोया और सूर्योदय तक सोता रहा | तत्पश्चात अपने संध्या आदि से अवकाश प्राप्त करके मैं उठा और यात्रा के लिये चला |

(डा. रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान
कृत 'महर्षि दयानन्द जीवन वृत और कृतित्व' से साभार उदृत‌)