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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (15)

...प्राणायाम के द्वारा जब यह श्वास बाहर रोक दिया जाता है तब मनुष्य के भीतर श्वास लेने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हो जाती है | उसका फल यह होता है कि श्वास भीतर लेते समय श्वास वेग के साथ तेज हवा व आँधी के सदृश होकर फेफड़े में पहुँचता है और जिस प्रकार आँधी व तेज हवा नगर के कोने कोने में प्रवेश करती है, इसी प्रकार वेग के साथ श्वास के द्वारा भीतर लिया हुआ वायु फेफड़े के एक एक कोश तक पहुँचता जाता है | उससे न तो फेफड़े में ही कोई विकार होने पाता है और न रक्त ही दूषित होने पाता है | अस्तु देख लिया गया कि प्राणायाम शरीर की उन्नति का हेतु ही नहीं, अपितु मुख्य हेतु है | इसलिए स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक नर-नारी के लिए आवश्यक है कि प्राणायाम किया करे | यह शारीरिक उन्नति का विवरण हुआ | इसी प्रकार इससे मानसिक उन्नति भी होती है | निदान दोनों प्रकार के कर्त्तव्य प्राणायाम से विशेष सम्बन्ध रखते हैं |

(अब गतांक से आगे)

दोनों कर्त्तव्यों पर एक दृष्टि

उपर्युक्त 6 मन्त्रों पर दृष्टिपात करने से जिनमें दोनों कर्तव्यों का विधान है, एक और बात भी विचार में आती है और वह यह है कि इन दोनों कर्त्तव्यों का सफलता के साथ पालन करने से मनुष्य मृत्यु के बन्धन से छूटता और अमरता प्राप्त करता है | परन्तु थोड़ा से भी सोचने से यह बात समझ में आ जाती है कि मृत्यु के बन्धन से छूटना और अमरता प्राप्त करना -‍ दोनों का भाव असल में एक ही है | इसलिए मन्त्रों का स्पष्ट भाव यह है कि मृत्यु के पार होना न केवल ज्ञान का परिणाम है और न केवल कर्म का , किन्तु ज्ञान और कर्म के समुच्चय ही से बन्धन छूटता है | परन्तु मुक्ति के दो पहलु होते हैं - एक मृत्यु से पार होना जिसे शान्ति या ऋणात्मक (Negative) आनन्द कहते हैं और दूसरा आनन्द प्राप्ति जिसे धनात्मक (Positive) आनन्द कहते हैं | इसमें से पहली बात , मृत्यु के बन्धन के पार होना तो हमारे कर्म और ज्ञान का परिणाम है, परन्तु दूसरी बात धनात्मक आनन्द न हमारे कर्म का परिणाम है, न ज्ञान का | फिर वह किस प्रकार प्राप्त होता है ? कठोपनिषद् इसका उत्तर देती है | उपनिषद् का वह वाक्य यह है -

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन |
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ||

कठ. 1|2|23||

अर्थात वह परमात्मा प्रवचन, बुद्धि और बहुश्रुत होने से प्राप्त नहीं होता | फिर वह प्राप्त किस प्रकार होता है ? उपनिषद् का उत्तर है कि जिसको वह स्वयं स्वीकार कर लेता है, उसी पर अपने को प्रकट कर देता है | उपनिषद् के इस वाक्य से यह तो ज्ञात हुआ कि आनन्दघन प्रभु अपनी दया ही से उपासकों को प्राप्त हुआ करता है | परन्तु वह कब किसी को मिला करता है ? इसका उत्तर यह है कि जब मनुष्य कर्म और ज्ञान को उन्नत करके अपने को उसकी कृपा का पात्र बना लेते हैं, जैसा कि ऋग्वेद में कहा है कि

" न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
ऋग्वेद 4|3|11||

अर्थात जब तक मनुष्य यत्न करके अपने को थका नहीं डालता, तब तक ईश्वर की दया का पात्र नहीं बनता | उसका यत्न कर्म और ज्ञान को उत्कृष्ट बनाने से हुआ करता है | जब मनुष्य यह यत्न पूरा कर लिया करता है, तभी उसे वह प्राप्त हो जाया करता है | जिस प्रकार एक छोटा बालक जो अभी केवल घुटनों के बल चलता है, खड़ी हुई माता के चरणों तक पहुँच गया, परन्तु इतने से उसकी भूख निवृत नहीं होती | जब बालक अपना यत्न समाप्त करके आशाभरी दृष्टि से माता की ओर निहारता है , तो माता के हृदय में दया के भाव जागृत होते हैं और वह उसे गोद में उठाकर दूध पिलाकर शान्त कर देती है | इस प्रकार मुमुक्षु जब अपने उन्नत कर्म और ज्ञान से मृत्यु के पार हो जाता है, तभी प्रभु दया करके उसे प्राप्त होकर आनन्दरूपी दुग्ध का पान कराके कृतकृत्य कर दिया करते हैं | अस्तु यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिये कि -

ईश्वरोपासना के दो भेद हैं

1. सगुणोपासना 2. निर्गुणोपासना |

इनमें सगुणोपासना वह है, जिससे ईश्वर को सगुणता के साथ कि वह न्यायकारी है, दयालु है, आनन्दस्वरूप है, इत्यादि हृदय में धारणा की जाती है और दूसरी निर्गुणोपासना वह है जिसमें ईश्वर की निर्गुणता के साथ कि वह अजर है, अमर है, अनादि है, अनन्त है, इत्यादि हृदय में धारणा की जाती है | दोनों उपासनाओं के फल इस प्रकार हैं :-

निर्गुणोपासना का फल

ईश्वर की निर्गुणोपासना का यह प्रभाव उपासक पर पड़ता है, जिससे उसमें भी निर्गुणता आती है | यदि ईश्वर अमर है तो वह भी अमर बनता है | इस प्रभाव से उपासक में कुछ आता नहीं, अपितु कुछ जाता है, परन्तु इस जाने ही से प्रसन्नता होती है, इसलिए इस प्रसन्नता को ऋणात्मक आनन्द (शान्ति) कहते हैं | एक जगह उपनिषद् में कहा गया है :-

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाSरसन्नित्यमगन्धवच्च यत् |
अनाद्यनन्त‌म्महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ||

कठ. 1|3|15||

अर्थात ईश्वर अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य, अगन्ध, अनादि, अनन्त है | इस प्रकार उस महान परम ध्रुव का (उसकी निर्गुणता का) निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त करने से मनुष्य मृत्यु के मुख से छूटता है | मृत्यु के मुख से छूटना ही ऋणात्मक आनन्द है |

सगुणोपासना का फल

परन्तु जब ईश्वर की सगुणोपासना की जाती है, तो ईश्वरीय गुणों के प्रभाव से उपासक को सगुणता की प्राप्ति से आनन्द की प्राप्ति होती है | इसका भी प्रमाण है :-

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति |
तमात्मस्थं येSनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतन्नेतरेषाम् ||

अर्थात ईश्वर एक, सबको वश में रखने वाला, सर्वव्यापक, एक रूप वाली प्रकृति को अनेक प्रकार का बना देने वाला है, उसका जो धीर पुरुष आत्मस्थ होकर साक्षात्कार करते हैं, उन्हीं को चिरस्थायी सुख (आनन्द) प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं | यही धनात्मक आनन्द है, जो सगुणोपासना से प्राप्त हुआ करता है |

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् |
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||15||

भावार्थ -

सत्यस्य, मुखम्............सत्य का मुख
हिरण्मयेन पात्रेण............सुवर्ण के पात्र से
अपिहितम्...................ढका हुआ है,
पूषऩ्.........................हे पूषन् !
सत्यधर्माय, दृष्टये..........उस सत्य धर्म के दिखाई देने के लिये
त्वम्.........................तू
तत्...........................उस आवरण को
अपावृणु......................हटा दे |

व्याख्या -

मनुष्य के कर्त्तव्य का विधान करते हुए उपनिषद् ने मनुष्यों को चेतावनी दी है कि इन कर्त्तव्यों का पालन करने में सचाई (वास्तविकता = Reality) होनी चाहिए | अन्यथा इनकी उपयोगिता न रहेगी | परन्तु संसार में सचाई के छिपा देने के भी साधन मौदूद हैं जिनसे वह दबा दी जाती है | उन्हीं साधनों की ओर मन्त्र में संकेत किया गया है |

क्रमशः