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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सब काव्य वचन उसी के लिए

ओउम् ! अस्मा इत्काव्यं वच उक्थमिन्द्राय शंस्यम् |
तस्मा उ ब्रह्मवाहसे गिरो वर्धन्त्यत्रयो गिरः शुभ्भन्त्यत्रयः ||

ऋग्वेद 5|39|5||

शब्दार्थ -

अस्मै...................इस
इन्द्राय.................इन्द्र के लिए
इत्.....................ही
काव्यम्................कवियों का कमनीय
उक्थम्.................प्रशस्त तथा
शंस्यम्.................प्रशंसनीय
वचः....................वचन है |
तस्मै+उ...............उस ही
ब्रह्मवाहसे..............ब्रह्मधारक, वेदधारक, ब्रह्मनिष्ट के लिए
अत्रयः..................त्रिदोशरहित, मिथ्या-परुष-असम्बद्ध दोषों से शून्य
गिरः....................वाणियाँ
वर्धन्ति.................बढ़ती हैं और
अत्रयः...................भोजनसामग्री देनेवाली
गिरः....................वाणियाँ
शुभ्भन्ति...............शुभाचरण कराती हैं |

व्याख्या -

वेद काव्य है | भगवान को कविर्मनीषी (य. 40|8) बुद्धिमान कवि कहा गया है | उसके दो काव्य हैं : एक वेद, जो वचः = वचनात्मक है, दूसरा उसकी कृति जगत् | ये दोनो ही अस्मै इत इन्द्राय इसी जीव के लिए हैं | यह काव्य वचः वेदवचन उक्थ कहने योग्य हैं अर्थात पढ़्ने पढ़ाने योग्य है | यह शंस्यम प्रशंसा के योग्य है | जो इस उक्थ, शंस्य काव्य=वचन को आत्मसात् कर लेता है, अपना जीवन उसके अनुसार बना लेता है तस्मा उ ब्रह्मवाहसे गिरा वर्धन्त्यत्रयः = उस ब्रह्मधारक, ब्रह्मनिष्ट, वेदानुयायी के लिए ही त्रिदोषरहित वाणिंयाँ बढ़ती हैं | वेद सब वाणियों का मूल है, सबसे पहले वेद ही मनुष्य को प्राप्त हुआ | वेद द्वारा ही वाणी तथा ज्ञान संसार में फैले | जिसने समस्त वाणियों के मूल पर अपना अधिकार कर लिया, समस्त संसार की स्तुतियों का वह अधिकारी हो जाता है | लोग उसकी महिमा का बखान करने के लिए नित्य नये नये काव्य रचते हैं | दूर दूर तक उसकी कीर्ति का कीर्त्तन करते हैं | आस्तिकों की वाणी में भी कभी कभी तीन - ‍अनृत, कठोर तथा अप्रासङ्गिक भाषारूप - दोष आ जाया करते हैं, कितु ब्रह्मनिष्ठों की सच्ची स्तुतियाँ की जाती हैं | वेदवाणियाँ - अत्रयः - त्रिदोषरहिता होती हैं | उनकी कोरी प्रशंसा ही नहीं होती, वरन् उन्हें अन्नादि खाद्यसामग्री की कमी भी नहीं रहती |

जिनके पास ज्ञान की खान हो, वह उसके द्वारा धन-धान्य अर्जन कर सकता है | यह ठीक है, ब्रह्मवित् महात्मा धन में आसक्त नहीं होता, धन को - प्राकृतिक धन - सम्पत्ति को - अपने जीवन का लक्ष्य नहीं बनाता, वह ब्रह्म को ही परम धन मानता है | उसको यदि ब्रह्मधन तथा लोकधन में से चुनने को कहा जाए, तो निस्सन्देह वह ब्रह्मधन का वरण करेगा | किन्तु उसे यह भी ज्ञान है कि यह सम्पूर्ण ऐश्वर्य भी उसी के लिए है | शरीर यात्रा के लिए सांसारिक धन की अपेक्षा होती है, अतः वह उसकी उपेक्षा नहीं करता | यह ठीक है वह उसके पीछे भागता भी नहीं है | इस बात को कभी भी न भूलना चाहिए कि वेद सरस्वती और लक्ष्मी का विरोध नहीं मानता | इस मन्त्र में भी उसकी ओर संकेत है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)