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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (16)

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् |
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||15||

भावार्थ -

सत्यस्य, मुखम्............सत्य का मुख
हिरण्मयेन पात्रेण............सुवर्ण के पात्र से
अपिहितम्...................ढका हुआ है,
पूषऩ्.........................हे पूषन् !
सत्यधर्माय, दृष्टये..........उस सत्य धर्म के दिखाई देने के लिये
त्वम्.........................तू
तत्...........................उस आवरण को
अपावृणु......................हटा दे |

व्याख्या -

मनुष्य के कर्त्तव्य का विधान करते हुए उपनिषद् ने मनुष्यों को चेतावनी दी है कि इन कर्त्तव्यों का पालन करने में सचाई (वास्तविकता = Reality) होनी चाहिए | अन्यथा इनकी उपयोगिता न रहेगी | परन्तु संसार में सचाई के छिपा देने के भी साधन मौदूद हैं जिनसे वह दबा दी जाती है | उन्हीं साधनों की ओर मन्त्र में संकेत किया गया है |

(अब गतांक से आगे)

सुवर्णमय पात्र (संसार की चमक दमक वाली चीजें) ही वे पदार्थ हैं, जो मनुष्य को प्रलोभन में लाकर उसे सत्य पथ से विमुख कर दिया करते हैं मनुष्य क्यों चोरी करता है ? धन के लालच से | मनुष्य क्यों किसी को धोखा देता है ? क्यों किसी को ठगता है ? धन के लालच से | मनुष्य क्यों कचहरियों में झूठी गवाही देता है ? धन के लालच से | अभी पश्चिमी युद्ध के समय पश्चिमी राज्य-कर्मचारियों ने क्यों झूठ बोल बोलकर अन्यों को धोखा देने का अपना मनतव्य और मुख्य कर्त्तव्य बना रखा था | इसका भी कारण वही धन का प्रलोभन है |

निदान सत्यता से विमुख होने के ये और इसी प्रकार के प्रलोभन ही कारण हुआ करते हैं | इसीलिए मन्त्र में प्रार्थना की गयी है कि पूषन् (पालक ईश्वर) इस प्रलोभन का आवरण सत्यता के ऊपर से उठ जाय, जिससे सत्यता हमसे और हम सत्यता से पृथक न हों | सत्यता का इतना मान क्यों है, केवल इसलिये कि सत्यता का ही दूसरा नाम धर्म है | बृहदारण्यकोपनिषद् में लिखा है

यो वै स धर्मः सत्यं वै तत् तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धम्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीति (बृहद्. 1|4|14)

अर्थात निश्चय से जो धर्म है, वही सत्य है, इसीलिए सत्य कहने पर कहा जाता है कि धर्म कहता है, और धर्म को कहते हुए, कहा जाता है कि सत्य कहता है | परिणाम स्पष्ट है कि सत्य और धर्म वास्तव में एक ही वस्तु हैं | सत्य से धर्म और धर्म से सत्य भिन्न नहीं | एक दूसरी जगह ब्रह्म का नाम 'सत्यम्' कहा गया है | ब्रह्म को सत्यम क्यों कहते हैं ? इसलिये कि 'सत्यम्' शब्द तीन शब्दों से बनता है | 'स +ति + यम्', (देखो बृहद्. 5|5|1) 'स' जीव का वाचक है, 'ति' नाशवान् ब्रह्माण्ड के लिये, 'यम' जीव ब्रह्माण्ड दोनों को नियम में रखने वाला होने से, ब्रह्म का ही नाम है | सुतराम् अनेक रीति से सत्य की महिमा उपनिषद् में बखानी गयी है | वह 'सत्य' नामक ब्रह्म कहाँ है ? उपनिषद् का उत्तर है, 'तत्सत्ये प्रतिष्ठितम्' (बृहद्. 5|14|4) अर्थात वह सत्य में ही प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्य (ब्रह्म) को प्राप्त करने के लिये सत्य से पृथक् नहीं होना चाहिये, किन्तु उसे पूर्ण रीति से प्राप्त कर लेना चाहिये | इसलिये उपनिषद् ने इस मन्त्र में चेतावनी दी है कि ऐसी महत्त्वपूर्ण वस्तु 'सत्य' आवरण रहित ही रहनी चाहिये, और इसलिये मनुष्य का कर्त्तव्य है कि उस पर सुवर्णमय पात्रों का आवरण न पड़ने दें | तभी वह अपने कर्त्तव्यों के पालन करने और उद्देश्य को प्राप्त कर लेने में सफल मनोरथ‌ हो सकता है | कर्त्तव्य विधान के बाद उसकी पूर्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है ‍

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह |
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते प‌श्यामि योSसावसौ
पुरुषः सोSहमस्मि ||16||

भाषार्थ -
पूषऩ्.................हे सर्वपोषक
एकर्षे.................अद्वितीय
यम...................न्यायकारी
सूर्य...................प्रकाश्-स्वरूप
प्राजापत्य............प्रजापति
रश्मीऩ्...............ताप (दुःखप्रद किरणों को)
व्यूह..................दूर कर
तेज...................और सुखप्रद तेज को
समूह.................प्राप्त करा,
यत्...................जो
ते.....................आपका
कल्याणतमम्.........अत्यन्त मंगलमय
रूपम्................रूप है
तत्...................आपके उस रूप को
पश्यामि..............मैं देखता हूं, इसलिये
यः.....................जो
असौ पुरुषः............वह पुरुष (ईश्वर) है
सः.....................वह
अहम् अस्मि...........मैं हूं |

व्याख्या -
मन्त्र में सच्चिदानन्द स्वरूप ईश्वर से, सच्चित् जीव को सच्चिदानन्द बना देने की याचना की गयी है और वे साधन भी, जिनसे सच्चित् जीव सच्चिदानन्द बन सकता है, बताये गये हैं | वे ये हैं :-

(क्रमशः)