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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'धर्म प्रचार' - पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक कृत 'कुलियात आर्य मुसाफिर 'से (1)

हमारी आर्य जाति अविद्यान्धकार की निद्रा में सो गई है | अब इसे जागते हुए संकोच होता है कहां वह ऋषि मुनियों का पवित्र युग और कहां उनकी वर्त्तमान संतति की यह दुर्गति | त्राहिमां त्राहि माम् |

प्रिय‌ भाईयो ! 4990 वर्ष हुए जबकि महाराजा युधिष्ठर का चक्रवर्ती धर्मराज पृथ्वी में वर्त्तमान था | उस समय कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई जैन इस भारतवर्ष में विद्यमान नहीं था | प्रत्युत सारे संसार में भी कहीं उनका चिन्ह तक न था | समस्त प्रजा वैदिकधर्म और शास्त्रोक्त कर्म में संलग्न थी | शतियों पश्चात जब अविद्या के कारण मद्यमांस व्याभिचार आदि इस देश में बढ़ने लगा | तब 2490 वर्ष बीते कि नेपाल प्रान्त में एक साखी सिंह नामक व्यक्ति ने जो नास्तिक था बुद्धमत चलाया | राजबल भी साथ था | उसी लोभ से बहुत से पेट पालक ब्राह्मण उसके साथ हो गए जिससे बुद्धमत सारे भारत में फैल गया | काशी, कश्मीर, कन्नौज के अतिरिक्त कोई नगर भारत में ऐसा न रहा जो बौद्ध न हो गया हो | जब यह मत बहुत बढ़ गया और लोग वेदधर्म से पतित हुए | यज्ञोपवीत आदि संस्कार छोड़ बैठे | तब दो सौ वर्ष के लगभग हुए कि एक महात्मा शंकर स्वामी (जिसे लोग स्वामी शंकराचार्य भी कहते हैं) ने कटिबद्ध हो शिष्यों सहित बौद्धों से शास्त्रार्थ करने आरम्भ किये | भला नास्तिक लोगों के हेत्वाभास वेद शास्त्रज्ञ के सम्मुख क्या प्रभाव डाल सकते थे ?

एक दो प्रसिद्ध स्थानों पर विजयी होने के कारण शंकर स्वामी का सिंहनाद दूर 2 तक गुंजायमान हो उठा | बहुत से राजाओं ने वैदिक धर्म स्वीकार कर लिया | दस बारह वर्ष में ही शंकराचार्य के शास्त्राथों के कारण समस्त देश के बौद्धों में हलचल मच गई | शंकराचार्य के शास्त्रार्थों में यह शर्तें होती थीं कि :-

(1) जो पराजित हो अर्थात शास्त्रार्थ में हारे वह दूसरे का धर्म स्वीकार करे |

(2) यदि साधू हो तो संन्यासी का शिष्य हो जाए |

(3) यदि यह दोनों बातें स्वीकार नहीं तो आर्यावर्त देश छोड़ जाये |

इन तीन नियमों के कारण करोड़ों बौद्ध और जैन पुनः वैदिक धर्म में आए और प्रायश्चित किया | उनको शंकर स्वामी ने गायत्री बताई | यज्ञोपवीत पहनाए | जो बहुत हठी थे और पक्षपात की अग्नि में जल रहे थे | इस प्रकार के लाखों व्यक्ति आर्यावर्त्त से निकल गए | राजाओं की ओर से काश्मीर, नैपाल, केपकुमारी, सूरत , बंगाल आदि भारत के सीमान्त स्थानों पर संन्यासियों के मठ बनाए गए और वहां सेना भी रही जिससे बौद्ध वापिस न आ सकें |

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि भारत, जिससे व‌ह धर्म उत्पन्न हुआ और एक समय ऐसा भी आया जबकि सारा भारत बौद्ध था परन्तु अब उस भारत में उस मत का व्यक्ति भी दृष्टिगोचर नहीं होता | भारत के चारों ओर लंका, ब्रह्मा, चीन, जापान, रूस, अफगानिस्तान, बलोचिस्तान आदि में करोडों बौद्ध हैं | जैनी अब भी भारत में बहुत न्यून अर्थात् 6-7 लाख हैं | यह लोग छिप छिप कर कहीं गुप्तरूप से रह गए | महात्मा शंकराचार्य जी 32 वर्ष की अवस्था में परलोक सिधार गए | अन्यथा देखते कि वही ऋषि मुनियों का युग पुनः लौट आता | शंकराचार्य की ओर से जन्म के जैनियों और बौद्धों के लिये केवल यही प्रायश्चित था कि एक दो दिन व्रत रखवा कर उन्हें यज्ञोपवीत पहनाया जाए और गायत्री मन्त्र बताया जाए | परिणामस्वरूप 25 करोड़ मनुष्य प्रायश्चित कर, गायत्री पढ़, यज्ञोपवीत पहन वर्णाश्रम धर्म में आगये | जब कि चार पांच सौ वर्षों तक वह बौद्ध और जैन रहे | बौद्ध लोग वर्णाश्रम को नहीं मानते | खाना पीना भी उनका वेद विरुद्ध है | वह सब प्रकार का मांस खा लेते हैं | चीन के इतिहास और ब्रह्मा के वृत्तान्त से यह बात सब लोग ज्ञात कर सकते हैं | 1200 वर्ष हुए कि यहां पर मुसलमानों ने सूरत और अफ्गानीस्तान की ओर् से चढ़ाई की | आर्यावर्त्त में वैदिक धर्म छूट जाने और पुराणों के प्रचार के कारण सैकड़ों मत थे | इन वेद विरुद्ध मतों के कारण घर घर में फूट हो रही थी | धर्म के न रहने और वाममार्ग के फैलने से व्याभिचार भी बहुत फैला हुआ था | व्याभिचार प्रसार तथा अल्पायु के विवाहों के कारण बल, शक्ति, ब्रह्मचर्य और उत्साह का नाश हो रहा था | ऐसी अवस्था में एक जंगली जाति का हमारे देश पर विजयी होना कौन सा कठिन कार्य था ? हमारी निर्बलता का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि सोमनाथ के युद्ध में महमूद के साथ 10-15 हजार सेना थी और हिन्दु राजाओं के पास 10-15 लाख सेना थी | परन्तु हिन्दु ही पराजित हुए और महमूद विजयी हुआ | आप जानते हैं कि सौ हजार का एक लाख होता है | मानो एक अफगान के सम्मुख सौ हिन्दु थे | ऐसे अवसर पर पराजित होने का कारण ब्रह्मचर्य की हानि और धर्माभाव ही था और कारण इसके अतिरिक्त न था | आप ध्यान से विचार कर लें | तारीखे हिद में लिखा है कि इस देश में सर्वप्रथम बापा (राजा चित्तौड़) एक मुसलमानी पर आसक्त होकर मुसलमान हो गया | परन्तु लज्जा से खुरासान चला गया और वहां ही मर गया | उसके पीछे उसका हिन्दु बेटा राजगद्दी पर बैठा |

दूसरा इस देश में सुखपाल (राजा लाहोर‌) धन और राज्य के लोभ से महमूद के समय में मुसलमान हो गया | जिस पर महमूद उसको राजा बना कर चला गया | महमूद के जाने के पश्चात वह पुनः हिन्दु हो गया और ब्राह्मणों ने उसे मिला लिया |

काश्मीर एक बादशाह के अत्याचार से बलपूर्वक मुसलमान किया गया | अभी तक उनकी उपजातियां भट्ट कौल आदि हैं |

ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन सब में से जो 2 मुसलमान हुए, प्रायः बल प्रयोग से हुए | कोई प्रसन्नता, आनन्द अथवा इसलाम को पसन्द करके मुसलमान‌ नहीं हुआ |

बहुत से लोग जागीर आदि के लोभ से मुसलमान हुए जिनकी वंशावलियां स्पष्ट बताती हैं कि पिता पितामह अथवा दो तीन पीढ़ी से ऊपर वे हिन्दु थे |

बहुत से हिन्दु युवक मुसलमानी वैश्याओं के प्रेमपाश में बन्दी हो कर विधर्मीं हुए | जो अपने प्रेमियों को इसी दीन की शिक्षा दिया करती हैं | जिनके पहले और अब भी सहस्त्रों उदाहरण प्रत्येक प्रान्त और भाग में मिलते हैं |

बड़े 2 योग्य पण्डित भी वेश्याओं के अन्धकूप में डूब गये |उदाहरणार्थ गंगा लहरी के रचयिता जगन्नाथ शास्त्री हैं |

(क्रमशः)